मनुष्य के सारे प्रयास शरीर को स्वस्थ रखने के लिए होते हैं , मन को स्वस्थ और परिष्कृत करने का कोई प्रयास मनुष्य नहीं करता l काम , क्रोध , लोभ , ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ जिसके मन में है वह न तो खुद शान्ति से रहता है और न और किसी को शान्ति से जीने देता है l एक व्यक्ति जो क्रोधी है , अहंकारी है , तो उसका यह दुर्गुण परिवार , समाज सब जगह अशान्ति उत्पन्न करता है l जिसे सिगरेट आदि नशे की लत है वह समाज में कोई सकारात्मक योगदान नहीं देते वरन अपने जैसे पचास और नशेड़ी तैयार कर लेते हैं l इसी प्रकार जो लोभी है , लालची है वह अपने साथ बेईमानों की पूरी श्रंखला तैयार कर लेता है l ऐसे दुष्प्रवृत्तियों वाले लोगों की अधिकता से ही दंगे , अपराध , लूटमार होते हैं l आज जरुरत है कि पूरी दुनिया में ऐसी संस्थाएं हों जो लोगों को ईमानदारी , सच्चाई , संवेदना , ईश्वरविश्वास , धैर्य , कर्तव्यपालन जैसे सद्गुण सिखाएं और क्रोध , लालच , ईर्ष्या-द्वेष जैसे दुर्गुणों को त्यागना , आदि की शिक्षा देकर ' नैतिकता ' में बड़ी -बड़ी डिग्री दें l इन सब के साथ जरुरी है लोग आलस को त्यागे , कर्मयोगी बने l
Wednesday, 21 June 2017
Tuesday, 20 June 2017
आत्मविश्वास जरुरी है
जीवन में सफलता के लिए आत्मविश्वास जरुरी है l अनेक लोग ऐसे होते हैं जो संघर्ष कर के जीवन में आगे बढ़ते हैं , सफल भी होते हैं लेकिन आत्मविश्वास की कमी के कारण वे हमेशा अपने से पद व धन -सम्पन्नता में बड़े व्यक्ति की चापलूसी करते रहते हैं , उनके सब कार्य उस व्यक्ति को खुश करने के लिए होते हैं l इसलिए उनसे कोई लोक कल्याण नहीं हो पाता l अति चापलूसी से व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नहीं रह जाता l सर्वप्रथम हमें अपनी योग्यता पर विश्वास होना चाहिए , अहंकार नहीं l हमारा प्रत्येक कार्य किसी व्यक्ति विशेष को खुश करने के लिए नहीं , ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए होना चाहिए l ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जब ईमानदारी , सच्चाई और मनोयोग से जब हम कोई छोटा सा काम भी करते हैं तो वह पूजा बन जाता है जिससे आगे सफलता के रास्ते खुलते जाते हैं l
Monday, 19 June 2017
शांति कैसे हो ? जब लोग स्वयं को सुधारना ही नहीं चाहते
संसार में अच्छे लोग भी हैं लेकिन उनकी संख्या कम है और वे बिखरे हुए हैं l अधिकांश लोग अहंकारी हैं , जो सिर्फ अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं जिन्हें लोगों के हित से कोई मतलब नहीं है , केवल उनका स्वार्थ पूरा होना चाहिए l ऐसे लोग बदलना नहीं चाहते l अहंकार की वजह से स्वयं को गलत समझते ही नहीं हैं तो सुधार कैसे हो ? जब अच्छाई संगठित हो उसका प्रभाव जन -मानस पर पड़े तभी शांति संभव है l
Friday, 16 June 2017
सुख शान्ति से जीने के लिए हमें आध्यात्मिक होना होगा l
अध्यात्म का अर्थ - जीवन से भागना नहीं है , संन्यासी बनना नहीं है l अध्यात्म का अर्थ है -- अपने अवगुणों को पहचानकर उन्हें दूर करना , सद्गुणों को अपनाना , कार्य को कुशलता से करना l कुशलता का मतलब चालाकी नहीं l कर्तव्य पालन ईमानदारी से हो तो संसार की अधिकांश समस्याएं हल हो जाएँ l योग की विभिन्न क्रियाओं से लाभ प्राप्त करने के लिए मन का परिष्कार जरुरी है l
यदि मन में छल - कपट , ईर्ष्या-द्वेष है , हमारा मन दूसरों को धोखा देने , उन्हें नीचा दिखाने, उनका हक छीनने में लगा है तो सारी बाहरी क्रियाएं व्यर्थ हैं l तरह तरह के आसन कर के भी चेहरा मलिन रहेगा l आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हो सकेगी l मन का परिष्कार ही अध्यात्म है l
यदि मन में छल - कपट , ईर्ष्या-द्वेष है , हमारा मन दूसरों को धोखा देने , उन्हें नीचा दिखाने, उनका हक छीनने में लगा है तो सारी बाहरी क्रियाएं व्यर्थ हैं l तरह तरह के आसन कर के भी चेहरा मलिन रहेगा l आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हो सकेगी l मन का परिष्कार ही अध्यात्म है l
Wednesday, 14 June 2017
सुख शान्ति से जीने के लिए संवेदना की जरुरत है
संवेदना न होने से परिवार टूट रहे हैं , अत्याचार और अन्याय बढ़ा है l पहले छोटी - छोटी रियासते थीं , तो यह स्पष्ट था कि वहीँ के शक्तिशाली कमजोर पर अत्याचार कर रहे हैं l अब वैश्विकरण का युग है , बाजार की तरह अत्याचार , अन्याय , भ्रष्टाचार और अपराध ---- यह सब भी वैश्विक स्तर पर है l आज इंटरनेट के युग में यह समझना बहुत कठिन है कि सामने जो अपराध या अत्याचार कर रहा है उसकी डोर किस के हाथ में है , अपनी कमजोरियों के कारण वह किसके इशारों पर काम कर रहा है l आज की सबसे बड़ी जरुरत है --हम अपना आत्मिक बल बढ़ाएं l नि:स्वार्थ भाव से , ईमानदारी से कर्तव्य पालन करना ही एक तपस्या है l ऐसा कर के शान्ति से रहा जा सकता है है
संसार में सुख - शांति के लिए जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना अनिवार्य है
नारी और पुरुष एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं , एक पहिया अच्छा हो और दूसरा पंक्चर हो तो गाड़ी नहीं चलेगी l इसी तरह नारी और पुरुष में से एक वर्ग सन्मार्ग पर चले और दूसरा स्वेच्छाचारी हो तो समाज का सही ढंग से विकास नहीं हो सकता l सबसे बड़ी जरुरत यही है कि नारी और पुरुष दोनों ही सद्गुणों को अपने जीवन में अपनाएं तभी वे आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दे सकेंगे l
Sunday, 11 June 2017
अशान्ति इसलिए है कि लोग ईश्वर का नाम तो लेते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते
संसार में विभिन्न धर्म हैं , ईश्वर के अनेक रूप हैं l लोग अपने - अपने तरीके से ईश्वर का नाम लेते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते l धर्म ग्रंथों में बताये गए श्रेष्ठ मार्ग को , सद्गुणों को नहीं अपनाते इसलिए स्वयं अशांत रहकर दूसरों को भी अशांत करते हैं l यदि मनुष्य अपने अहंकार को छोड़ दे तो ईश्वर के नाम में इतनी शक्ति है जो युद्ध की आग को भी शांत कर देती है l एक प्राचीन कथा है जो बड़े - बुजुर्ग सुनाया करते थे ----
एक राजा बड़ा अहंकारी था , उसमे अनेक सद्गुण थे लेकिन वे सब अहंकार से ढक गए थे l एक बार किसी अन्य राजा से उसका विवाद हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई l वह राजा भगवान् श्री राम का अनन्य भक्त था ,, उसे उनकी प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त थी l युद्ध शुरू होने पर उस अहंकारी राजा का किसी ने साथ न दिया क्योंकि सब जानते थे कि वह दूसरा राजा परम भक्त और प्रजापालक है l
जब अहंकारी राजा ने अपनी मृत्यु को निकट देखा तो घबराया l उसके एक वृद्ध मंत्री ने सलाह दी कि तुम श्री हनुमानजी की शरण में जाओ , केवल वे ही तुम्हे बचा सकते हैं और कोई नहीं l वह राजा अपना धन - वैभव , घोड़े - रथ सब छोड़ कर पैदल ही भागता - दौड़ता हनुमानजी के चरणों में गिर पड़ा , बोला --- उस भक्त राजा के पास भगवन श्री राम की दी हुई अमोघ शक्ति है उससे मेरी रक्षा करो l हनुमानजी ने उसे शरण दी और कहा - अहंकार छोड़ो, जैसा मैं कहूँ वैसा करो l उन्हें तुम अस्त्र -शस्त्र से नहीं जीत सकते l
युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं थीं --- एक ओर सद्गुण संपन्न , प्रजापालक राजा जिसे भगवान् राम का संरक्षण था और दूसरी और वह राजा - जो अहंकार छोड़ने का संकल्प ले चुका था हनुमानजी की शरण में था l बड़ा अदभुत द्रश्य था l श्री हनुमानजी ने उसे तीन मन्त्र बताये उनके जपने से बड़ी से बड़ी शक्ति से भी कोई अहित नहीं होगा ---- ' सीता -राम , सीता - राम '
' श्री राम जय राम , जय - जय राम ' श्री राम जय राम , जय - जय राम '
इन दोनों मन्त्रों के जपने से किसी शक्ति बाण ने उसका अहित नहीं किया , नमन कर वापस लौट गईं l तो प्रतिपक्षी राजा को बड़ी हैरानी हुई l अब उसने सबसे शक्ति शाली बाण चलाया , प्रलय की सी स्थिति उत्पन्न हो गई l तब हनुमानजी ने उससे कहा -- सन्मार्ग पर चलने का , अपनी शक्ति का लोक - हित में उपयोग करने का संकल्प लो , फिर सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान कर जप करो ' रघुपति राघव राजा राम , पतित पावन सीता राम '
वह शक्ति भी शांत हो गई और युद्ध समाप्त हो गया l कथा का सार यही है कि हम ईश्वर का नाम लेने के साथ सन्मार्ग पर चलें , अपनी बुराइयों को छोड़ें , तभी शांति संभव है
एक राजा बड़ा अहंकारी था , उसमे अनेक सद्गुण थे लेकिन वे सब अहंकार से ढक गए थे l एक बार किसी अन्य राजा से उसका विवाद हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई l वह राजा भगवान् श्री राम का अनन्य भक्त था ,, उसे उनकी प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त थी l युद्ध शुरू होने पर उस अहंकारी राजा का किसी ने साथ न दिया क्योंकि सब जानते थे कि वह दूसरा राजा परम भक्त और प्रजापालक है l
जब अहंकारी राजा ने अपनी मृत्यु को निकट देखा तो घबराया l उसके एक वृद्ध मंत्री ने सलाह दी कि तुम श्री हनुमानजी की शरण में जाओ , केवल वे ही तुम्हे बचा सकते हैं और कोई नहीं l वह राजा अपना धन - वैभव , घोड़े - रथ सब छोड़ कर पैदल ही भागता - दौड़ता हनुमानजी के चरणों में गिर पड़ा , बोला --- उस भक्त राजा के पास भगवन श्री राम की दी हुई अमोघ शक्ति है उससे मेरी रक्षा करो l हनुमानजी ने उसे शरण दी और कहा - अहंकार छोड़ो, जैसा मैं कहूँ वैसा करो l उन्हें तुम अस्त्र -शस्त्र से नहीं जीत सकते l
युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं थीं --- एक ओर सद्गुण संपन्न , प्रजापालक राजा जिसे भगवान् राम का संरक्षण था और दूसरी और वह राजा - जो अहंकार छोड़ने का संकल्प ले चुका था हनुमानजी की शरण में था l बड़ा अदभुत द्रश्य था l श्री हनुमानजी ने उसे तीन मन्त्र बताये उनके जपने से बड़ी से बड़ी शक्ति से भी कोई अहित नहीं होगा ---- ' सीता -राम , सीता - राम '
' श्री राम जय राम , जय - जय राम ' श्री राम जय राम , जय - जय राम '
इन दोनों मन्त्रों के जपने से किसी शक्ति बाण ने उसका अहित नहीं किया , नमन कर वापस लौट गईं l तो प्रतिपक्षी राजा को बड़ी हैरानी हुई l अब उसने सबसे शक्ति शाली बाण चलाया , प्रलय की सी स्थिति उत्पन्न हो गई l तब हनुमानजी ने उससे कहा -- सन्मार्ग पर चलने का , अपनी शक्ति का लोक - हित में उपयोग करने का संकल्प लो , फिर सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान कर जप करो ' रघुपति राघव राजा राम , पतित पावन सीता राम '
वह शक्ति भी शांत हो गई और युद्ध समाप्त हो गया l कथा का सार यही है कि हम ईश्वर का नाम लेने के साथ सन्मार्ग पर चलें , अपनी बुराइयों को छोड़ें , तभी शांति संभव है
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