Saturday, 30 September 2017

आत्म - निरीक्षण जरुरी है

   संसार  में  समय - समय  पर  आपदाएं  आती  रहती  हैं  , कुछ  प्राकृतिक  हैं  तो  अनेक  दुर्घटनाएं  मानवीय  भूलों  का  परिणाम  हैं  l  ऐसी  दुर्घटनाओं  में  अनेक  लोगों  की  मृत्यु  हो  जाती  है  अनेक  परिवार  बिखर  जाते  हैं   l   सबसे  बड़ी  बात  यह  है  कि   ये  दुर्घटनाएं  यह  नहीं  देखतीं   कि  --- किस  दल  को  मारें ,  किस  धर्म ,  किस  समुदाय ,  नारी  अथवा  पुरुष  किस  पर  प्रकोप  दिखाएँ  ?   इन  दुर्घटनाओं  में  तो   अच्छे - बुरे ,  ऊँच - नीच ,  छोटे - बड़े ,  किसी  पर  भी  विपत्ति  आ  सकती  है    l    प्रत्येक  मनुष्य   जब   अपने     ---- अधिकार  और  कर्तव्य  ----   दोनों  के  प्रति  जागरूक  होगा   तभी  समस्या  हल  हो  सकती  है   l 

Friday, 29 September 2017

कर्तव्यपालन में ईमानदारी न होना

     समाज  में    असमानता  है 


  समाज  में  अनेक  समस्याएं  हैं  ,  उनके  मूल  में  एक  ही  कारण  है  कि   जो  व्यक्ति  जहाँ  लगा  है  वह  ईमानदारी  से काम  नहीं  कर  रहा   l   लोग  गरीबों  से , मेहनत - मजदूरी  करने  वालों  से  और  बहुत  कम  वेतन  पाने  वालों  से  ईमानदारी    की   उम्मीद  करते  हैं  ,  थोड़ा  भी  काम  गलत  होने  पर  उनसे  दुर्व्यवहार  करते  हैं   l  लेकिन  ये  वर्ग  भी  क्या  करे  ?  जब  देखते  हैं  कि  एक  से  एक  अमीर   और  समर्थ  लोग  अपनी  जेब  भरने  में  लगे  हैं  ,  ईमानदारी  है  ही  नहीं ,  तो  ये  लोग  भी   अपने  काम  में  लापरवाह  रहते  हैं  ,    इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  होगा  कि  हम  सब  एक  माला  के  मोती  हैं  ,     एक  मोती  भी  खराब  होगा  तो  माला  तो  माला  सही  नहीं  रहेगी  l
























Wednesday, 27 September 2017

अशांति का कारण है ----- नारी - उत्पीड़न

  जिस  भी  समाज  में  नारी  को  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  किया  जाता  है ,  वहां  अशान्ति  होती  है  ,  विकास  अवरुद्ध  हो  जाता  है   l  परिवारों  में   महिलाओं  पर   दहेज़ हत्या , भ्रूण  हत्या  आदि  अनेक  कारणों  से  अत्याचार  होते  हैं   l  पढने- लिखने ,  नौकरी  करने , स्वयं  को  सक्षम  बनाने   के  लिए  जब  वे  घर  से  बाहर  जाती  हैं   तो  वहां  भी  उत्पीड़न  होता  है  l
  नारी  उत्पीड़न  के  लिए  कोई  एक  विशेष  वर्ग ,  विशेष  धर्म ,  विशेष  जाति,  समूह  जिम्मेदार  नहीं  है  ,  इसका  मुख्य  कारण    है  पुरुषों  की  मानसिकता ,  उनकी  शोषण  करने   और  हुकूमत  ज़माने   की   प्रवृति  l   समस्या  इसलिए  विकट  हो  गई  है  कि   अब  वासना , कामना  और  धन   की    तृष्णा  ने  पुरुषों  में  कायरता  को  बढ़ा  दिया  है  l  पहले  के  पुरुषों  में  स्वाभिमान  था ,  वे   महिलाओं  से  मदद  लेना  अपने  पौरुष  के  विरुद्ध  समझते  थे   लेकिन  अब  पुरुषों  ने  नारी - सुलभ  कमजोरियों   और  उनके   घर - बाहर  के  दोहरे   दायित्व    की   उनकी  व्यस्तता   का  लाभ  उठाकर   उन्हें  भ्रष्टाचार  का    माध्यम  बना  लिया  है  l  पहले  केवल  पुरुष  भ्रष्टाचार  में  लिप्त  थे   लेकिन  अब  उन्होंने  अपने  दांवपेंच  लगाकर   महिलाओं  को  भी  जोड़  लिया  l   इससे  समाज  में  भ्रष्टाचार  और  अपराध   दोनों  बढ़े  हैं   l   अनेक  महिलाओं  को  तो  इस  बात  का  ज्ञान  ही  नहीं  होता  कि  उनकी  योग्यता  और  कुशलता  का  कोई  फायदा  उठा  रहा  है ,  कुछ  को  ज्ञान  होता  है   लेकिन  वे  अपनी  कमजोरियों  के  कारण  चुप  रहती  हैं   या  यों  कहें  कि  चक्रव्यूह  में  फंसकर  निकलना  मुश्किल  होता  है  l     कुछ  महिलाएं  जिनका  विवेक  जाग्रत  है ,  जिन  पर  ईश्वर  की  कृपा  है   वे  इस  जाल  से  बच   जाती  हैं    तो  ' हारे  हुए  जुआरी '   की   तरह  पुरुष  उसका  जीना  मुश्किल  कर  देते  हैं  l
   नारी  शिक्षित  हो  या  न  हो  ,  परिवार  में ,  समाज  में  उसका  उत्पीड़न  हर  हाल  में  है  l   इस  स्थिति  से  उबरने  के  लिए   नारी  को  ही   जागरूक  होना  पड़ेगा   l  शिक्षित  होने  के  साथ  ही  जीवन  जीने  की  कला  का  ज्ञान  जरुरी  है  l   माँ  दुर्गा  की  पूजा  ही  पर्याप्त  नहीं  है  ,  हमें  सद्गुणों  को  अपने  आचरण  में  लाना  होगा   l 

Tuesday, 26 September 2017

मनुष्य को स्वयं ही सुधरना होगा

 समाज  में  अशांति  हो ,  लोग  मर्यादाहीन  आचरण  कर  रहे  हों ,   असुरता  बढ़  रही  हो  ----  और  हम  सोचें  कि  भगवान  आयेंगे  ,  फिर  सब  ठीक  हो  जायेगा  --- यह  असंभव  है  l  महिलाओं  पर  बढ़ते  अत्याचार ,  उन्हें  अपमानित  व  उपेक्षित  करना  ---- ये  सब  ऐसी  बातें  हैं  जिनका  प्रभाव  दीर्घकालीन  होता  है   और  ये   घटनाएँ  परिवार , समाज  सब  जगह  अशांति  उत्पन्न  करती  है    l
  पुरुषों  ने  युगों  से    नारी  को  अपनी  दासी  समझा  है   और  हर  तरह  से  अत्याचार  किया  है  l   अनेक  महान  पुरुषों  के  प्रयासों  से  जब  महिलाएं  आगे  बढ़  रही  हैं   तो   अब  पुरुष  वर्ग  यह  सहन  नहीं  कर  पा  रहा  ,  उनकी    नारी  जाति  के  प्रति  ईर्ष्या  बढ़  गई  है  l   बाहरी  जीवन  में  पुरुष  केवल  उन्ही महिलाओं    की    उपस्थिति  को  स्वीकार    करते  हैं   जो  उनके  भ्रष्टाचार   में  सहयोग  दे ,  उनके  इशारों  पर  काम  करे       महिलाओं  पर  अत्याचार  की  घटनाओं  से   नारी  तो  अपमानित , उत्पीड़ित  होती  है  ,  ऐसी  घटनाओं  से  सम्पूर्ण  पुरुष  जाति     नारी    की    निगाहों  में  अपना  सम्मान  खो  देती  है  l   नारी  को  तो  अपमान ,  उपेक्षा  सहने  की  आदत  बन  चुकी  है  ,  लेकिन  जब  पुरुष  वर्ग  को  सम्मान  नहीं  मिलता  तो  उनमे  हीनता  का  भाव  पैदा  हो  जाता  है   l
  ऐसी  समस्या  से  निपटने  के  लिए   समाज  के    सम्भ्रांत  पुरुषों  को  ही  आगे  आना  होगा    जो   मर्यादाहीन  आचरण  करने  वाले  लोगों  पर  लगाम  लगायें    l  श्रेष्ठ   आचरण  से  ही    समाज  में  सुधार  संभव  है  ,  '    बाबाओं '  ने  तो  समाज  को  पतन  के  गर्त  में  धकेलने  में  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी   l 

Friday, 22 September 2017

अशांति का कारण है -- मनुष्य सरल रास्ते से तरक्की चाहता है

  धन - दौलत  और  पद - प्रतिष्ठा  हर  व्यक्ति  चाहता  है   l  महत्वाकांक्षी  होना  अच्छी  बात  है  ,  लेकिन  आज  के  समय  में   लोगों  में  धैर्य  नहीं  है  ,  सब  कुछ  बिना   मेहनत  के  और  बहुत  जल्दी   पा  लेना चाहते  हैं  l   इसके  लिए   ऐसे  लोगों  के  पास  एक  ही  तरीका  है --- जिसके  माध्यम  से    सब  कुछ  अति  शीघ्र   हासिल  हो  सके  ,  उसकी  खुशामद  करो  l  लोग   इस  कदर   चापलूसी   करते  हैं  जैसे  वह  व्यक्ति  भगवान  हो  ,  जिसमे  उनके  भाग्य  बदलने   की    क्षमता   हो  l
  इस  एक  दोष  के  कारण  समाज  का  वातावरण  दूषित  होता  है  l  जिसकी चापलूसी    की   जाती  है   उसका  अहंकार  उसके  सिर  चढ़  जाता  है    वह  सब  पर  अपनी  हुकूमत  चलाना  चाहता  है  l  
  जो  चापलूसी  करता  है   वह    धन - सम्पदा  तो   इकट्ठी  कर  लेता  है   लेकिन   अपनी  योग्यता  नहीं  बढ़ाता,  उसका  व्यक्तित्व  खोखला  हो  जाता  है  l   वह  भी  अपने  लिए  चापलूसों   की  भीड़  चाहता  है   और  इसके  लिए  हर  प्रकार  के  तरीके  अपनाता   है ,  इसी  कारण  समाज  में  अशांति होती  है   l 

Wednesday, 20 September 2017

WISDOM ----- वेश - विन्यास से अपनी राष्ट्रीयता और संस्कृति का परिचय मिलता है

 चिकित्सा  विशेषज्ञों  का  मानना  है  कि  तंग  वस्त्र  और  शरीर  का  प्रदर्शन  करने  वाले  वस्त्र   स्वास्थ्य  की  द्रष्टि  से  उपयुक्त  नहीं  हैं  l   अपनी  संस्कृति  के  प्रति  श्रद्धा  रखने  वाले  लोगों  का  विचार  है  कि    ऐसे  वस्त्रों  में  विवेकहीनता  और  फूहड़पन  झलकता  है   l   अपने  देश ,  अपनी  संस्कृति   के  अनुरूप  पहनावा  ही  इस  बात  कि  सूचना  देता  है  कि  हम  राजनीतिक  रूप  से  ही  नहीं  ,  मानसिक  और  संस्कृतिक  रूप  से  भी  स्वतंत्र  हैं  l
  बात  उन  दिनों  कि  है  जब  विश्वविख्यात   रसायन  वैज्ञानिक   डॉ. प्रफुल्लचंद्र  राय  कलकत्ता  विश्वविद्यालय में  प्रोफेसर  थे  l   पूरे  देश  में  स्वाधीनता  के  लिए  राष्ट्रीय  भावनाएं  हिलोरें  ले  रहीं  थीं  l   डॉ.  प्रफुल्लचंद्र  राय   का  अंतर्मन  इनसे  अछूता  न  रह  सका   l   अपने  वैज्ञानिक  कार्यों  के  बीच   राष्ट्र प्रेम  को  किस  तरह  निभाएं   ?  यह  जानने  के  लिए  वे  गांधीजी  से  मिलने  गए   l
          गांधीजी  ने  उन्हें  ऊपर  से  नीचे  तक  देखा  और  कहा --- " राय  महाशय  !  इतनी  भी  जल्दी  क्या  थी  जो  आप  ऐसे  ही  चले  आये  l "   महात्मा  गाँधी  कि  बात  ने  उन्हें  हैरानी  में  डाल  दिया  ,  तब  गांधीजी  ने     कहा ---- ------             " विदेशी  ढंग  के  कपड़े  पहन  कर  सही  ढंग  से  राष्ट्र  सेवा  नहीं  की  जा  सकती   l  राष्ट्रीय  मूल्य , राष्ट्रीय  भावनाएं   एवं  राष्ट्रीय  संस्कृति  ,  इन  सबकी  एक  ही  पहचान  है , अपना  राष्ट्रीय  वेश - विन्यास  l "  अब  बापू    बातें  प्रोफेसर  राय   की    समझ  में  आ  गईं  l  उस  दिन  से  उन्होंने  अपना  पहनावा     पूरी  तरह  बदल  डाला  l  देशी  खद्दर  का  देशी  पहनावा   जीवन  के  अंतिम  क्षणों  तक  उनका   साथी  रहा   l 

Tuesday, 19 September 2017

संस्कृति की रक्षा जरुरी है

  भारतीय  संस्कृति    को  मिटाने  के   अनेकों  प्रयास  हुए   लेकिन   ' कुछ  बात  है  कि  हस्ती  मिटती  नहीं  हमारी   l '  
   आज  हम  सबको  जागरूक  होने    की  जरुरत  है   l    कहीं  दंगा  हो ,  बम विस्फोट  हो  ,  दहशत   की     वजह  से  जानमाल  की   हानि  हो   तो  उस  क्षेत्र  विशेष  के  लोग  उस  घटना  को  भूल  नहीं   पाते  l    डर  उनके  ह्रदय  में  समां  जाता  है  ,  सामान्य   स्थिति  में  आने  में  बहुत  समय  लग  जाता  है   l
  हम  बच्चों  के  कोमल  मन    की   कल्पना  कर  सकते  हैं  ,  स्कूलों  में  बच्चों  को  टार्चर  किया  जाये ,  किसी  बच्चे  का  मर्डर  हो  जाये ,  अज्ञात  कारण  से  किसी  बच्चे    की    स्कूल  में  मृत्यु  हो  जाये   तो  ऐसी  घटनाओं  का   सीधा   प्रभाव    बच्चों  के  आत्मविश्वास  पर  पड़ता है  ,  वे  भयभीत  रहने  लगते  हैं  ,  उनका  सही  मानसिक  विकास  नहीं  हो  पाता ,  आत्मविश्वास  डगमगाने  लगता  है   l  ऐसी  घटनाएँ   बच्चों  के  सम्पूर्ण  व्यक्तित्व  को  प्रभावित  करती  है    l
  एक  देश  का  वैभव  उसका  कुशल और  आत्मविश्वास  से  भरपूर  मानवीय  संसाधन  है   l   आज  के  बच्चे  ही  ,  कल  देश  की  कार्यशील   जनसँख्या   हैं  ,  देश  का  भविष्य  हैं   l  ऐसे  आतंकियों  से  उनकी  रक्षा  करना ,  उन्हें  संरक्षण  देना   अनिवार्य  है  l