Wednesday, 15 November 2017

दंड का भय न होने से अपराध बढ़ते है

     यदि  समाज  में  ऊँच - नीच , छोटे - बड़े ,  अमीर - गरीब  आदि  भेदभाव  न  करके  प्रत्येक  अपराधी  को  उसके  अपराध  के  लिए  दंड  दिया  जाये  ,  तो  लोग  अपराध  करने  से  डरेंगे  l   लेकिन  ऐसा  होता  नहीं  है  l  जब  लोग   जानते  हैं   कि  वे  कैसा  भी  अपराध  करें  उनके  '  आका '  उन्हें   दंड  से  बचा  लेंगे ,  समाज  उन्हें  बहिष्कृत  नहीं  करेगा  बल्कि  अपने  छोटे - बड़े    स्वार्थ  को  पूरा  करने  के  लिए   उनकी  पहचान  से  फायदा  उठाएगा  ,  तब  ऐसे  लोग  अपनी - अपनी  मानसिकता  के  अनुरूप  कभी  खुलकर  ,  कभी  छुपकर घोर  अपराध  करते  हैं  l    जो  लोग  प्रत्यक्ष रूप  से  अपराध  कर  रहे  हैं ,  वे  तो  अपराधी  हैं  ही ,  लेकिन  जो  लोग   इन  अपराधियों  को  शह  देते  हैं ,  कानून  से  बचने  में  उनकी  हर  संभव  मदद  करते  हैं ,  अपने  अनैतिक  कार्य  और  बड़े - बड़े  स्वार्थ  उनसे  पूरे  कराते  हैं ,  वे  भी  उन  अपराधों  में  बराबर  के  भागीदार  हैं  l   अब  समाज  को  जागरूक  होना  पड़ेगा  ,  संगठित  होना  होगा   कि  अपराधियों  को   बहिष्कृत  करे ,  चाहे  उनका  समाज  में  कोई  भी  स्टेटस  हो  l
   आज  की  सबसे  बड़ी विडम्बना  यह  है  कि  लोग  अपनी  दुर्बुद्धि  के  कारण  और  अपराधियों  के  खौफ  के  कारण   अपराधियों  का  ही साथ  दे  रहे  हैं  और  अच्छाई  को  बहिष्कृत  कर  रहे  हैं   l  जागरूकता  जरुरी  है  l 

Saturday, 14 October 2017

मानसिक प्रदूषण अशांति का बड़ा कारण है

   नशा , मांसाहार , निम्न  स्तर  का  साहित्य   और  वैसी  ही  फिल्म  देखने   आदि  अनेक  कारणों  से  आज  लोगों  की  मानसिकता  प्रदूषित  हो  गई  है   और  इस  प्रदूषण  ने  बच्चे , युवा ,  प्रौढ़ , वृद्ध  सबको  अपनी  गिरफ्त  में  ले  लिया  है   l  इसी  कारण  समाज  में  अपराध  में  वृद्धि  हुई  है  ,  दंड  का  भय  न  होने  से  पाशविकता  और  बढ़ती  जाती  है  l 
     प्रत्येक  व्यक्ति ,  प्रत्येक  परिवार  स्वयं  अपना   सुधार  करे    तभी  सकारात्मक  परिवर्तन  संभव  होगा  l 

Thursday, 12 October 2017

धन के लालच ने वर्ग भेद और जाति - भेद और ऊँच - नीच के मायने बदल दिए

  समाज  में  एक  वर्ग  ऐसा  तैयार  हो  गया  है   जिसका  उद्देश्य   हर  तरीके  से  धन  कमाना ,  लोगों  पर  प्रभुत्व  जमाना   और  अपनी  झूठी  शान  को  बनाये  रखना  है  l   जो  उनके  इस  ' स्वार्थ '  में  मदद  करते  हैं   उनकी  कठपुतली  बन  कर  रहते  हैं  ,  उन्हें  हर  तरह  का  लाभांश  मिलता  रहता  है  , फिर  उनकी  जाति,  धर्म , वर्ग  कुछ  भी  हो  कोई  फरक  नहीं  पड़ता , पुरुष  हो  या  महिला  हो ,  उनके  इशारों  पर  चले  तो  ठीक  अन्यथा   जीना  मुश्किल  कर  देंगे  l  यह  वर्ग  ' एक्स '  है
  दूसरा  वर्ग   ' वाई ' वह  है  जिसका  विवेक  जाग्रत  है  ,  वह  किसी  के  हाथ  की  कठपुतली  नहीं  बनता , ईमानदारी  से  जीता  है ,  ईमानदारी  उसकी  मजबूरी  नहीं   उसका  स्वभाव  है ,  उसके  संस्कार  हैं   l   वर्ग 'एक्स '   मन  ही  मन  इससे  भयभीत  रहता  है   ,   इसका  ऐसे  बायकाट  करता  है   जैसे  इसने  कोई  भयंकर  अपराध  किया  हो   l  अब  ईमानदारी  और  सच्चाई  से  जीने  वाला   अछूतों  की  श्रेणी  में  आ  गया  है  l 
  इस  समाज  से  ऊपर  एक  प्राकृतिक  व्यवस्था  है    जहाँ  तराजू  से  तोलकर   न्याय  होता  है   l   जिनके  जीवन  की  दिशा  गलत  है   और  जो  ऐसे  गलत  लोगों  का , अन्यायी  का  साथ  देते  हैं  ,  उन्हें  सांसारिक  लाभ  चाहे  जितना  मिल  जाये  लेकिन  तरह - तरह  की  मुसीबतें ,  परेशानी ,  अशांति  उनके  हिस्से  में  आती  है   l   जो  सही  मार्ग  पर  चलते  हैं  , किसी  का  अहित  नहीं  करते  हैं   उनको   परेशानियाँ  एक  हलके  कांटे  की  तरह  छूकर  निकल  जाती  हैं   l  इस  संसार  में  जो  सबसे   अनमोल  है  ' मन  की  शान्ति '  इनके  पास  होती  है   l 
  प्रत्येक  व्यक्ति  के  सामने  ये  दोनों  रास्ते  हैं  ,  व्यक्ति  को  स्वयं  चयन  करना  है  कि  वह   किस  रास्ते  पर  चले  ?    अपने  स्वाभिमान  को  खोकर   संसार  को  खुश  रखे   या     अपनी  आत्मा  को ,  ह्रदय  में  बैठे  ईश्वर  को  प्रसन्न  कर  सिर  उठाकर   चले   l  

Monday, 2 October 2017

संवेदनहीन समाज अशांत और अव्यवस्थित होता है

  आज  की  सबसे  बड़ी  समस्या  है   कि  लोगों  के  ह्रदय  में  संवेदना  समाप्त  हो  चुकी  है  l  अब  लोग   दूसरे की  मृत्यु  का  , दूसरों  के  कष्ट  का  तमाशा  देखते  हैं ,  वीडिओ  बनाते  हैं  l   किसी  की  मदद  नहीं  करते  l  यदि  कोई  मदद  करना  भी  चाहे    तो  दुष्ट  प्रवृति  के  लोग   उस  पीड़ित  व्यक्ति  को  इतना  टार्चर  करते  हैं ,  उस  पर  दबाव  बनाते  हैं  कि  वह  उस  मदद  करने  वाले  के  पास  न  जाये  l   क्योंकि  यदि  पीड़ित  व्यक्ति  किसी  नि:स्वार्थ  सेवा भाव  वाले  के  पास  चले  गए  तो  उसको  यश  मिल  जायेगा ,  यह  स्वार्थी  समाज  से  सहन  नहीं  होगा   कि  किसी  को  यश  मिले  ,  तारीफ  मिले  l  और  सबसे  बढ़कर  भ्रष्टाचार  में  बाधा  उपस्थित  होगी  l
   ऐसे   स्वार्थी  और  संवेदनहीन  समाज  में   आपदाएं , विपदाएं  आती  हैं  ,  लोग  मौखिक  रूप  से  दुःख  मना  कर  ,  अपने  ऐश- आराम  में  मगन  हो  जाते  हैं  l 
         जाके  पैर  न   फटे  बिवाई ,  वो  का  जाने  पीर  पराई  l 

Saturday, 30 September 2017

आत्म - निरीक्षण जरुरी है

   संसार  में  समय - समय  पर  आपदाएं  आती  रहती  हैं  , कुछ  प्राकृतिक  हैं  तो  अनेक  दुर्घटनाएं  मानवीय  भूलों  का  परिणाम  हैं  l  ऐसी  दुर्घटनाओं  में  अनेक  लोगों  की  मृत्यु  हो  जाती  है  अनेक  परिवार  बिखर  जाते  हैं   l   सबसे  बड़ी  बात  यह  है  कि   ये  दुर्घटनाएं  यह  नहीं  देखतीं   कि  --- किस  दल  को  मारें ,  किस  धर्म ,  किस  समुदाय ,  नारी  अथवा  पुरुष  किस  पर  प्रकोप  दिखाएँ  ?   इन  दुर्घटनाओं  में  तो   अच्छे - बुरे ,  ऊँच - नीच ,  छोटे - बड़े ,  किसी  पर  भी  विपत्ति  आ  सकती  है    l    प्रत्येक  मनुष्य   जब   अपने     ---- अधिकार  और  कर्तव्य  ----   दोनों  के  प्रति  जागरूक  होगा   तभी  समस्या  हल  हो  सकती  है   l 

Friday, 29 September 2017

कर्तव्यपालन में ईमानदारी न होना

     समाज  में    असमानता  है 


  समाज  में  अनेक  समस्याएं  हैं  ,  उनके  मूल  में  एक  ही  कारण  है  कि   जो  व्यक्ति  जहाँ  लगा  है  वह  ईमानदारी  से काम  नहीं  कर  रहा   l   लोग  गरीबों  से , मेहनत - मजदूरी  करने  वालों  से  और  बहुत  कम  वेतन  पाने  वालों  से  ईमानदारी    की   उम्मीद  करते  हैं  ,  थोड़ा  भी  काम  गलत  होने  पर  उनसे  दुर्व्यवहार  करते  हैं   l  लेकिन  ये  वर्ग  भी  क्या  करे  ?  जब  देखते  हैं  कि  एक  से  एक  अमीर   और  समर्थ  लोग  अपनी  जेब  भरने  में  लगे  हैं  ,  ईमानदारी  है  ही  नहीं ,  तो  ये  लोग  भी   अपने  काम  में  लापरवाह  रहते  हैं  ,    इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  होगा  कि  हम  सब  एक  माला  के  मोती  हैं  ,     एक  मोती  भी  खराब  होगा  तो  माला  तो  माला  सही  नहीं  रहेगी  l
























Wednesday, 27 September 2017

अशांति का कारण है ----- नारी - उत्पीड़न

  जिस  भी  समाज  में  नारी  को  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  किया  जाता  है ,  वहां  अशान्ति  होती  है  ,  विकास  अवरुद्ध  हो  जाता  है   l  परिवारों  में   महिलाओं  पर   दहेज़ हत्या , भ्रूण  हत्या  आदि  अनेक  कारणों  से  अत्याचार  होते  हैं   l  पढने- लिखने ,  नौकरी  करने , स्वयं  को  सक्षम  बनाने   के  लिए  जब  वे  घर  से  बाहर  जाती  हैं   तो  वहां  भी  उत्पीड़न  होता  है  l
  नारी  उत्पीड़न  के  लिए  कोई  एक  विशेष  वर्ग ,  विशेष  धर्म ,  विशेष  जाति,  समूह  जिम्मेदार  नहीं  है  ,  इसका  मुख्य  कारण    है  पुरुषों  की  मानसिकता ,  उनकी  शोषण  करने   और  हुकूमत  ज़माने   की   प्रवृति  l   समस्या  इसलिए  विकट  हो  गई  है  कि   अब  वासना , कामना  और  धन   की    तृष्णा  ने  पुरुषों  में  कायरता  को  बढ़ा  दिया  है  l  पहले  के  पुरुषों  में  स्वाभिमान  था ,  वे   महिलाओं  से  मदद  लेना  अपने  पौरुष  के  विरुद्ध  समझते  थे   लेकिन  अब  पुरुषों  ने  नारी - सुलभ  कमजोरियों   और  उनके   घर - बाहर  के  दोहरे   दायित्व    की   उनकी  व्यस्तता   का  लाभ  उठाकर   उन्हें  भ्रष्टाचार  का    माध्यम  बना  लिया  है  l  पहले  केवल  पुरुष  भ्रष्टाचार  में  लिप्त  थे   लेकिन  अब  उन्होंने  अपने  दांवपेंच  लगाकर   महिलाओं  को  भी  जोड़  लिया  l   इससे  समाज  में  भ्रष्टाचार  और  अपराध   दोनों  बढ़े  हैं   l   अनेक  महिलाओं  को  तो  इस  बात  का  ज्ञान  ही  नहीं  होता  कि  उनकी  योग्यता  और  कुशलता  का  कोई  फायदा  उठा  रहा  है ,  कुछ  को  ज्ञान  होता  है   लेकिन  वे  अपनी  कमजोरियों  के  कारण  चुप  रहती  हैं   या  यों  कहें  कि  चक्रव्यूह  में  फंसकर  निकलना  मुश्किल  होता  है  l     कुछ  महिलाएं  जिनका  विवेक  जाग्रत  है ,  जिन  पर  ईश्वर  की  कृपा  है   वे  इस  जाल  से  बच   जाती  हैं    तो  ' हारे  हुए  जुआरी '   की   तरह  पुरुष  उसका  जीना  मुश्किल  कर  देते  हैं  l
   नारी  शिक्षित  हो  या  न  हो  ,  परिवार  में ,  समाज  में  उसका  उत्पीड़न  हर  हाल  में  है  l   इस  स्थिति  से  उबरने  के  लिए   नारी  को  ही   जागरूक  होना  पड़ेगा   l  शिक्षित  होने  के  साथ  ही  जीवन  जीने  की  कला  का  ज्ञान  जरुरी  है  l   माँ  दुर्गा  की  पूजा  ही  पर्याप्त  नहीं  है  ,  हमें  सद्गुणों  को  अपने  आचरण  में  लाना  होगा   l