Wednesday, 15 November 2017

दंड का भय न होने से अपराध बढ़ते है

     यदि  समाज  में  ऊँच - नीच , छोटे - बड़े ,  अमीर - गरीब  आदि  भेदभाव  न  करके  प्रत्येक  अपराधी  को  उसके  अपराध  के  लिए  दंड  दिया  जाये  ,  तो  लोग  अपराध  करने  से  डरेंगे  l   लेकिन  ऐसा  होता  नहीं  है  l  जब  लोग   जानते  हैं   कि  वे  कैसा  भी  अपराध  करें  उनके  '  आका '  उन्हें   दंड  से  बचा  लेंगे ,  समाज  उन्हें  बहिष्कृत  नहीं  करेगा  बल्कि  अपने  छोटे - बड़े    स्वार्थ  को  पूरा  करने  के  लिए   उनकी  पहचान  से  फायदा  उठाएगा  ,  तब  ऐसे  लोग  अपनी - अपनी  मानसिकता  के  अनुरूप  कभी  खुलकर  ,  कभी  छुपकर घोर  अपराध  करते  हैं  l    जो  लोग  प्रत्यक्ष रूप  से  अपराध  कर  रहे  हैं ,  वे  तो  अपराधी  हैं  ही ,  लेकिन  जो  लोग   इन  अपराधियों  को  शह  देते  हैं ,  कानून  से  बचने  में  उनकी  हर  संभव  मदद  करते  हैं ,  अपने  अनैतिक  कार्य  और  बड़े - बड़े  स्वार्थ  उनसे  पूरे  कराते  हैं ,  वे  भी  उन  अपराधों  में  बराबर  के  भागीदार  हैं  l   अब  समाज  को  जागरूक  होना  पड़ेगा  ,  संगठित  होना  होगा   कि  अपराधियों  को   बहिष्कृत  करे ,  चाहे  उनका  समाज  में  कोई  भी  स्टेटस  हो  l
   आज  की  सबसे  बड़ी विडम्बना  यह  है  कि  लोग  अपनी  दुर्बुद्धि  के  कारण  और  अपराधियों  के  खौफ  के  कारण   अपराधियों  का  ही साथ  दे  रहे  हैं  और  अच्छाई  को  बहिष्कृत  कर  रहे  हैं   l  जागरूकता  जरुरी  है  l 

Saturday, 14 October 2017

मानसिक प्रदूषण अशांति का बड़ा कारण है

   नशा , मांसाहार , निम्न  स्तर  का  साहित्य   और  वैसी  ही  फिल्म  देखने   आदि  अनेक  कारणों  से  आज  लोगों  की  मानसिकता  प्रदूषित  हो  गई  है   और  इस  प्रदूषण  ने  बच्चे , युवा ,  प्रौढ़ , वृद्ध  सबको  अपनी  गिरफ्त  में  ले  लिया  है   l  इसी  कारण  समाज  में  अपराध  में  वृद्धि  हुई  है  ,  दंड  का  भय  न  होने  से  पाशविकता  और  बढ़ती  जाती  है  l 
     प्रत्येक  व्यक्ति ,  प्रत्येक  परिवार  स्वयं  अपना   सुधार  करे    तभी  सकारात्मक  परिवर्तन  संभव  होगा  l 

Thursday, 12 October 2017

धन के लालच ने वर्ग भेद और जाति - भेद और ऊँच - नीच के मायने बदल दिए

  समाज  में  एक  वर्ग  ऐसा  तैयार  हो  गया  है   जिसका  उद्देश्य   हर  तरीके  से  धन  कमाना ,  लोगों  पर  प्रभुत्व  जमाना   और  अपनी  झूठी  शान  को  बनाये  रखना  है  l   जो  उनके  इस  ' स्वार्थ '  में  मदद  करते  हैं   उनकी  कठपुतली  बन  कर  रहते  हैं  ,  उन्हें  हर  तरह  का  लाभांश  मिलता  रहता  है  , फिर  उनकी  जाति,  धर्म , वर्ग  कुछ  भी  हो  कोई  फरक  नहीं  पड़ता , पुरुष  हो  या  महिला  हो ,  उनके  इशारों  पर  चले  तो  ठीक  अन्यथा   जीना  मुश्किल  कर  देंगे  l  यह  वर्ग  ' एक्स '  है
  दूसरा  वर्ग   ' वाई ' वह  है  जिसका  विवेक  जाग्रत  है  ,  वह  किसी  के  हाथ  की  कठपुतली  नहीं  बनता , ईमानदारी  से  जीता  है ,  ईमानदारी  उसकी  मजबूरी  नहीं   उसका  स्वभाव  है ,  उसके  संस्कार  हैं   l   वर्ग 'एक्स '   मन  ही  मन  इससे  भयभीत  रहता  है   ,   इसका  ऐसे  बायकाट  करता  है   जैसे  इसने  कोई  भयंकर  अपराध  किया  हो   l  अब  ईमानदारी  और  सच्चाई  से  जीने  वाला   अछूतों  की  श्रेणी  में  आ  गया  है  l 
  इस  समाज  से  ऊपर  एक  प्राकृतिक  व्यवस्था  है    जहाँ  तराजू  से  तोलकर   न्याय  होता  है   l   जिनके  जीवन  की  दिशा  गलत  है   और  जो  ऐसे  गलत  लोगों  का , अन्यायी  का  साथ  देते  हैं  ,  उन्हें  सांसारिक  लाभ  चाहे  जितना  मिल  जाये  लेकिन  तरह - तरह  की  मुसीबतें ,  परेशानी ,  अशांति  उनके  हिस्से  में  आती  है   l   जो  सही  मार्ग  पर  चलते  हैं  , किसी  का  अहित  नहीं  करते  हैं   उनको   परेशानियाँ  एक  हलके  कांटे  की  तरह  छूकर  निकल  जाती  हैं   l  इस  संसार  में  जो  सबसे   अनमोल  है  ' मन  की  शान्ति '  इनके  पास  होती  है   l 
  प्रत्येक  व्यक्ति  के  सामने  ये  दोनों  रास्ते  हैं  ,  व्यक्ति  को  स्वयं  चयन  करना  है  कि  वह   किस  रास्ते  पर  चले  ?    अपने  स्वाभिमान  को  खोकर   संसार  को  खुश  रखे   या     अपनी  आत्मा  को ,  ह्रदय  में  बैठे  ईश्वर  को  प्रसन्न  कर  सिर  उठाकर   चले   l  

Monday, 2 October 2017

संवेदनहीन समाज अशांत और अव्यवस्थित होता है

  आज  की  सबसे  बड़ी  समस्या  है   कि  लोगों  के  ह्रदय  में  संवेदना  समाप्त  हो  चुकी  है  l  अब  लोग   दूसरे की  मृत्यु  का  , दूसरों  के  कष्ट  का  तमाशा  देखते  हैं ,  वीडिओ  बनाते  हैं  l   किसी  की  मदद  नहीं  करते  l  यदि  कोई  मदद  करना  भी  चाहे    तो  दुष्ट  प्रवृति  के  लोग   उस  पीड़ित  व्यक्ति  को  इतना  टार्चर  करते  हैं ,  उस  पर  दबाव  बनाते  हैं  कि  वह  उस  मदद  करने  वाले  के  पास  न  जाये  l   क्योंकि  यदि  पीड़ित  व्यक्ति  किसी  नि:स्वार्थ  सेवा भाव  वाले  के  पास  चले  गए  तो  उसको  यश  मिल  जायेगा ,  यह  स्वार्थी  समाज  से  सहन  नहीं  होगा   कि  किसी  को  यश  मिले  ,  तारीफ  मिले  l  और  सबसे  बढ़कर  भ्रष्टाचार  में  बाधा  उपस्थित  होगी  l
   ऐसे   स्वार्थी  और  संवेदनहीन  समाज  में   आपदाएं , विपदाएं  आती  हैं  ,  लोग  मौखिक  रूप  से  दुःख  मना  कर  ,  अपने  ऐश- आराम  में  मगन  हो  जाते  हैं  l 
         जाके  पैर  न   फटे  बिवाई ,  वो  का  जाने  पीर  पराई  l 

Saturday, 30 September 2017

आत्म - निरीक्षण जरुरी है

   संसार  में  समय - समय  पर  आपदाएं  आती  रहती  हैं  , कुछ  प्राकृतिक  हैं  तो  अनेक  दुर्घटनाएं  मानवीय  भूलों  का  परिणाम  हैं  l  ऐसी  दुर्घटनाओं  में  अनेक  लोगों  की  मृत्यु  हो  जाती  है  अनेक  परिवार  बिखर  जाते  हैं   l   सबसे  बड़ी  बात  यह  है  कि   ये  दुर्घटनाएं  यह  नहीं  देखतीं   कि  --- किस  दल  को  मारें ,  किस  धर्म ,  किस  समुदाय ,  नारी  अथवा  पुरुष  किस  पर  प्रकोप  दिखाएँ  ?   इन  दुर्घटनाओं  में  तो   अच्छे - बुरे ,  ऊँच - नीच ,  छोटे - बड़े ,  किसी  पर  भी  विपत्ति  आ  सकती  है    l    प्रत्येक  मनुष्य   जब   अपने     ---- अधिकार  और  कर्तव्य  ----   दोनों  के  प्रति  जागरूक  होगा   तभी  समस्या  हल  हो  सकती  है   l 

Friday, 29 September 2017

कर्तव्यपालन में ईमानदारी न होना

     समाज  में    असमानता  है 


  समाज  में  अनेक  समस्याएं  हैं  ,  उनके  मूल  में  एक  ही  कारण  है  कि   जो  व्यक्ति  जहाँ  लगा  है  वह  ईमानदारी  से काम  नहीं  कर  रहा   l   लोग  गरीबों  से , मेहनत - मजदूरी  करने  वालों  से  और  बहुत  कम  वेतन  पाने  वालों  से  ईमानदारी    की   उम्मीद  करते  हैं  ,  थोड़ा  भी  काम  गलत  होने  पर  उनसे  दुर्व्यवहार  करते  हैं   l  लेकिन  ये  वर्ग  भी  क्या  करे  ?  जब  देखते  हैं  कि  एक  से  एक  अमीर   और  समर्थ  लोग  अपनी  जेब  भरने  में  लगे  हैं  ,  ईमानदारी  है  ही  नहीं ,  तो  ये  लोग  भी   अपने  काम  में  लापरवाह  रहते  हैं  ,    इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  होगा  कि  हम  सब  एक  माला  के  मोती  हैं  ,     एक  मोती  भी  खराब  होगा  तो  माला  तो  माला  सही  नहीं  रहेगी  l
























Wednesday, 27 September 2017

अशांति का कारण है ----- नारी - उत्पीड़न

  जिस  भी  समाज  में  नारी  को  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  किया  जाता  है ,  वहां  अशान्ति  होती  है  ,  विकास  अवरुद्ध  हो  जाता  है   l  परिवारों  में   महिलाओं  पर   दहेज़ हत्या , भ्रूण  हत्या  आदि  अनेक  कारणों  से  अत्याचार  होते  हैं   l  पढने- लिखने ,  नौकरी  करने , स्वयं  को  सक्षम  बनाने   के  लिए  जब  वे  घर  से  बाहर  जाती  हैं   तो  वहां  भी  उत्पीड़न  होता  है  l
  नारी  उत्पीड़न  के  लिए  कोई  एक  विशेष  वर्ग ,  विशेष  धर्म ,  विशेष  जाति,  समूह  जिम्मेदार  नहीं  है  ,  इसका  मुख्य  कारण    है  पुरुषों  की  मानसिकता ,  उनकी  शोषण  करने   और  हुकूमत  ज़माने   की   प्रवृति  l   समस्या  इसलिए  विकट  हो  गई  है  कि   अब  वासना , कामना  और  धन   की    तृष्णा  ने  पुरुषों  में  कायरता  को  बढ़ा  दिया  है  l  पहले  के  पुरुषों  में  स्वाभिमान  था ,  वे   महिलाओं  से  मदद  लेना  अपने  पौरुष  के  विरुद्ध  समझते  थे   लेकिन  अब  पुरुषों  ने  नारी - सुलभ  कमजोरियों   और  उनके   घर - बाहर  के  दोहरे   दायित्व    की   उनकी  व्यस्तता   का  लाभ  उठाकर   उन्हें  भ्रष्टाचार  का    माध्यम  बना  लिया  है  l  पहले  केवल  पुरुष  भ्रष्टाचार  में  लिप्त  थे   लेकिन  अब  उन्होंने  अपने  दांवपेंच  लगाकर   महिलाओं  को  भी  जोड़  लिया  l   इससे  समाज  में  भ्रष्टाचार  और  अपराध   दोनों  बढ़े  हैं   l   अनेक  महिलाओं  को  तो  इस  बात  का  ज्ञान  ही  नहीं  होता  कि  उनकी  योग्यता  और  कुशलता  का  कोई  फायदा  उठा  रहा  है ,  कुछ  को  ज्ञान  होता  है   लेकिन  वे  अपनी  कमजोरियों  के  कारण  चुप  रहती  हैं   या  यों  कहें  कि  चक्रव्यूह  में  फंसकर  निकलना  मुश्किल  होता  है  l     कुछ  महिलाएं  जिनका  विवेक  जाग्रत  है ,  जिन  पर  ईश्वर  की  कृपा  है   वे  इस  जाल  से  बच   जाती  हैं    तो  ' हारे  हुए  जुआरी '   की   तरह  पुरुष  उसका  जीना  मुश्किल  कर  देते  हैं  l
   नारी  शिक्षित  हो  या  न  हो  ,  परिवार  में ,  समाज  में  उसका  उत्पीड़न  हर  हाल  में  है  l   इस  स्थिति  से  उबरने  के  लिए   नारी  को  ही   जागरूक  होना  पड़ेगा   l  शिक्षित  होने  के  साथ  ही  जीवन  जीने  की  कला  का  ज्ञान  जरुरी  है  l   माँ  दुर्गा  की  पूजा  ही  पर्याप्त  नहीं  है  ,  हमें  सद्गुणों  को  अपने  आचरण  में  लाना  होगा   l 

Tuesday, 26 September 2017

मनुष्य को स्वयं ही सुधरना होगा

 समाज  में  अशांति  हो ,  लोग  मर्यादाहीन  आचरण  कर  रहे  हों ,   असुरता  बढ़  रही  हो  ----  और  हम  सोचें  कि  भगवान  आयेंगे  ,  फिर  सब  ठीक  हो  जायेगा  --- यह  असंभव  है  l  महिलाओं  पर  बढ़ते  अत्याचार ,  उन्हें  अपमानित  व  उपेक्षित  करना  ---- ये  सब  ऐसी  बातें  हैं  जिनका  प्रभाव  दीर्घकालीन  होता  है   और  ये   घटनाएँ  परिवार , समाज  सब  जगह  अशांति  उत्पन्न  करती  है    l
  पुरुषों  ने  युगों  से    नारी  को  अपनी  दासी  समझा  है   और  हर  तरह  से  अत्याचार  किया  है  l   अनेक  महान  पुरुषों  के  प्रयासों  से  जब  महिलाएं  आगे  बढ़  रही  हैं   तो   अब  पुरुष  वर्ग  यह  सहन  नहीं  कर  पा  रहा  ,  उनकी    नारी  जाति  के  प्रति  ईर्ष्या  बढ़  गई  है  l   बाहरी  जीवन  में  पुरुष  केवल  उन्ही महिलाओं    की    उपस्थिति  को  स्वीकार    करते  हैं   जो  उनके  भ्रष्टाचार   में  सहयोग  दे ,  उनके  इशारों  पर  काम  करे       महिलाओं  पर  अत्याचार  की  घटनाओं  से   नारी  तो  अपमानित , उत्पीड़ित  होती  है  ,  ऐसी  घटनाओं  से  सम्पूर्ण  पुरुष  जाति     नारी    की    निगाहों  में  अपना  सम्मान  खो  देती  है  l   नारी  को  तो  अपमान ,  उपेक्षा  सहने  की  आदत  बन  चुकी  है  ,  लेकिन  जब  पुरुष  वर्ग  को  सम्मान  नहीं  मिलता  तो  उनमे  हीनता  का  भाव  पैदा  हो  जाता  है   l
  ऐसी  समस्या  से  निपटने  के  लिए   समाज  के    सम्भ्रांत  पुरुषों  को  ही  आगे  आना  होगा    जो   मर्यादाहीन  आचरण  करने  वाले  लोगों  पर  लगाम  लगायें    l  श्रेष्ठ   आचरण  से  ही    समाज  में  सुधार  संभव  है  ,  '    बाबाओं '  ने  तो  समाज  को  पतन  के  गर्त  में  धकेलने  में  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी   l 

Friday, 22 September 2017

अशांति का कारण है -- मनुष्य सरल रास्ते से तरक्की चाहता है

  धन - दौलत  और  पद - प्रतिष्ठा  हर  व्यक्ति  चाहता  है   l  महत्वाकांक्षी  होना  अच्छी  बात  है  ,  लेकिन  आज  के  समय  में   लोगों  में  धैर्य  नहीं  है  ,  सब  कुछ  बिना   मेहनत  के  और  बहुत  जल्दी   पा  लेना चाहते  हैं  l   इसके  लिए   ऐसे  लोगों  के  पास  एक  ही  तरीका  है --- जिसके  माध्यम  से    सब  कुछ  अति  शीघ्र   हासिल  हो  सके  ,  उसकी  खुशामद  करो  l  लोग   इस  कदर   चापलूसी   करते  हैं  जैसे  वह  व्यक्ति  भगवान  हो  ,  जिसमे  उनके  भाग्य  बदलने   की    क्षमता   हो  l
  इस  एक  दोष  के  कारण  समाज  का  वातावरण  दूषित  होता  है  l  जिसकी चापलूसी    की   जाती  है   उसका  अहंकार  उसके  सिर  चढ़  जाता  है    वह  सब  पर  अपनी  हुकूमत  चलाना  चाहता  है  l  
  जो  चापलूसी  करता  है   वह    धन - सम्पदा  तो   इकट्ठी  कर  लेता  है   लेकिन   अपनी  योग्यता  नहीं  बढ़ाता,  उसका  व्यक्तित्व  खोखला  हो  जाता  है  l   वह  भी  अपने  लिए  चापलूसों   की  भीड़  चाहता  है   और  इसके  लिए  हर  प्रकार  के  तरीके  अपनाता   है ,  इसी  कारण  समाज  में  अशांति होती  है   l 

Wednesday, 20 September 2017

WISDOM ----- वेश - विन्यास से अपनी राष्ट्रीयता और संस्कृति का परिचय मिलता है

 चिकित्सा  विशेषज्ञों  का  मानना  है  कि  तंग  वस्त्र  और  शरीर  का  प्रदर्शन  करने  वाले  वस्त्र   स्वास्थ्य  की  द्रष्टि  से  उपयुक्त  नहीं  हैं  l   अपनी  संस्कृति  के  प्रति  श्रद्धा  रखने  वाले  लोगों  का  विचार  है  कि    ऐसे  वस्त्रों  में  विवेकहीनता  और  फूहड़पन  झलकता  है   l   अपने  देश ,  अपनी  संस्कृति   के  अनुरूप  पहनावा  ही  इस  बात  कि  सूचना  देता  है  कि  हम  राजनीतिक  रूप  से  ही  नहीं  ,  मानसिक  और  संस्कृतिक  रूप  से  भी  स्वतंत्र  हैं  l
  बात  उन  दिनों  कि  है  जब  विश्वविख्यात   रसायन  वैज्ञानिक   डॉ. प्रफुल्लचंद्र  राय  कलकत्ता  विश्वविद्यालय में  प्रोफेसर  थे  l   पूरे  देश  में  स्वाधीनता  के  लिए  राष्ट्रीय  भावनाएं  हिलोरें  ले  रहीं  थीं  l   डॉ.  प्रफुल्लचंद्र  राय   का  अंतर्मन  इनसे  अछूता  न  रह  सका   l   अपने  वैज्ञानिक  कार्यों  के  बीच   राष्ट्र प्रेम  को  किस  तरह  निभाएं   ?  यह  जानने  के  लिए  वे  गांधीजी  से  मिलने  गए   l
          गांधीजी  ने  उन्हें  ऊपर  से  नीचे  तक  देखा  और  कहा --- " राय  महाशय  !  इतनी  भी  जल्दी  क्या  थी  जो  आप  ऐसे  ही  चले  आये  l "   महात्मा  गाँधी  कि  बात  ने  उन्हें  हैरानी  में  डाल  दिया  ,  तब  गांधीजी  ने     कहा ---- ------             " विदेशी  ढंग  के  कपड़े  पहन  कर  सही  ढंग  से  राष्ट्र  सेवा  नहीं  की  जा  सकती   l  राष्ट्रीय  मूल्य , राष्ट्रीय  भावनाएं   एवं  राष्ट्रीय  संस्कृति  ,  इन  सबकी  एक  ही  पहचान  है , अपना  राष्ट्रीय  वेश - विन्यास  l "  अब  बापू    बातें  प्रोफेसर  राय   की    समझ  में  आ  गईं  l  उस  दिन  से  उन्होंने  अपना  पहनावा     पूरी  तरह  बदल  डाला  l  देशी  खद्दर  का  देशी  पहनावा   जीवन  के  अंतिम  क्षणों  तक  उनका   साथी  रहा   l 

Tuesday, 19 September 2017

संस्कृति की रक्षा जरुरी है

  भारतीय  संस्कृति    को  मिटाने  के   अनेकों  प्रयास  हुए   लेकिन   ' कुछ  बात  है  कि  हस्ती  मिटती  नहीं  हमारी   l '  
   आज  हम  सबको  जागरूक  होने    की  जरुरत  है   l    कहीं  दंगा  हो ,  बम विस्फोट  हो  ,  दहशत   की     वजह  से  जानमाल  की   हानि  हो   तो  उस  क्षेत्र  विशेष  के  लोग  उस  घटना  को  भूल  नहीं   पाते  l    डर  उनके  ह्रदय  में  समां  जाता  है  ,  सामान्य   स्थिति  में  आने  में  बहुत  समय  लग  जाता  है   l
  हम  बच्चों  के  कोमल  मन    की   कल्पना  कर  सकते  हैं  ,  स्कूलों  में  बच्चों  को  टार्चर  किया  जाये ,  किसी  बच्चे  का  मर्डर  हो  जाये ,  अज्ञात  कारण  से  किसी  बच्चे    की    स्कूल  में  मृत्यु  हो  जाये   तो  ऐसी  घटनाओं  का   सीधा   प्रभाव    बच्चों  के  आत्मविश्वास  पर  पड़ता है  ,  वे  भयभीत  रहने  लगते  हैं  ,  उनका  सही  मानसिक  विकास  नहीं  हो  पाता ,  आत्मविश्वास  डगमगाने  लगता  है   l  ऐसी  घटनाएँ   बच्चों  के  सम्पूर्ण  व्यक्तित्व  को  प्रभावित  करती  है    l
  एक  देश  का  वैभव  उसका  कुशल और  आत्मविश्वास  से  भरपूर  मानवीय  संसाधन  है   l   आज  के  बच्चे  ही  ,  कल  देश  की  कार्यशील   जनसँख्या   हैं  ,  देश  का  भविष्य  हैं   l  ऐसे  आतंकियों  से  उनकी  रक्षा  करना ,  उन्हें  संरक्षण  देना   अनिवार्य  है  l 

Monday, 18 September 2017

अन्याय और अत्याचार समाप्त क्यों नहीं होता ?

    अपराधी  यदि  पकड़  में  न  आये  ,  उसे  दंड  का  भय  न  हो ,  तो  उनके  हौसले  बुलंद  हो  जाते  हैं  और  उनके  भीतर  कायरता  बढ़ती  जाती  है  l     बच्चों    की    हत्या  करना   कायरता   की   चरम  सीमा  है  l  न्याय  की  अपनी  एक  प्रक्रिया  है   l     अपराध  इसलिए  बढ़ते  हैं   क्योंकि  समाज  संगठित  रूप  से  अपराधियों  का  बहिष्कार  नहीं  करता   l  बुरे  से  बुरा व्यक्ति  भी   समाज  में  अपनी  प्रतिष्ठा  बनाये  रखने  के  लिए    चेहरे  पर  शराफत  का  नकाब  ओढ़े  रहता  है  l   समाज  के  लोग  उसकी  असलियत  को  जानते  भी  हैं    लेकिन  अपने  छोटे - छोटे  स्वार्थ  के  लिए वे उससे  जुड़े  रहते  हैं  ,  ' गिव  एंड  टेक '  चलता  रहता  है       जनता  जागरूक  होगी  ,  संगठित  होगी  तभी  समस्याओं  से  मुक्ति  है   l   विज्ञान  ने  मनुष्य  को  इतना  बुद्धिमान  बना  दिया  है  कि  ' कठपुतली '   की    डोर  किसके  हाथ  में  है ,  यह  जानना  कठिन  है  l

Friday, 15 September 2017

वर्तमान के आधार पर ही भविष्य का निर्माण होता है

  सुनहरे  भविष्य  के  लिए  हमें  वर्तमान   में  ही  प्रयास  करना  होगा  l  बालक - बालिकाओं  का  जीवन  सुरक्षित  न  हो ,  युवा  पीढ़ी  के  जीवन  को  सही  दिशा  न  हो ,  अश्लीलता  अपने  चरम  पर  हो   और  जो  समर्थ  हैं  वे  धन , पद  और  प्रतिष्ठा   की   अंधी  दौड़  में  लगे  हों  ,  तो  भविष्य  कैसा  होगा  ?
    आज  लोगों  का  अहंकार  इस  कदर  बढ़  गया  है  कि   वे  बच्चों  को  निशाना  बना  कर ,  देश  के  भविष्य  पर , संस्कृति  पर  वार  कर   अपने   अहंकार  को  पोषित  कर  रहे  हैं   l
 जिस  प्रकार  दंड  का  भय  न  होने  से   व्यक्ति  अपराध  करता  है , अनैतिक  और  अमानवीय  कार्य  करता  है  ,      यदि  कठोर  दंड  का  भय  हो  तो  लोग  अपराध  करने  से  डरेंगे   जिससे  वातावरण  में  सुधार  होगा  l 

Thursday, 14 September 2017

संवेदनहीन समाज में अशान्ति होती है

  अब  लोगों  में  संवेदना  समाप्त  हो  गई  है  और  कायरता  बढ़  गई  है  l   भ्रूण  हत्या ,  छोटी  बच्चियों  के  साथ  अनैतिक   कार्य ,  स्कूल  में  पढने  वाले  बच्चों   की    निर्मम  हत्या ---- यह  सब  व्यक्ति  की  कायरता  के  प्रमाण  हैं  l  बाहरी  आतंकवाद  को  तो  सैन्य  शक्ति  मजबूत  कर  के  रोका  जा  सकता  है  लेकिन  देश  के  भीतर  ही  पीछे  से  वार  करने  वाले  आतंकियों  को  रोकने  से  ही  समाज  में  शान्ति  होगी  l  जिनके  ह्रदय  में  संवेदना  सूख  गई  है  ,    तो  इस  संवेदना  को  जगाने  का  , पुन:  हरा - भरा  करने  का  कोई   तरीका  नहीं  है  l   केवल  एक  ही  रास्ता  है --- ऐसे  अपराधियों  को  कठोर  और  शीघ्र  दण्ड  दिया  जाये   l  समाज  को  जागरूक  होना  पड़ेगा ,  जो  लोग  अपराधियों  को  संरक्षण  देते  हैं   उनका  सामूहिक  बहिष्कार  करें  l 

Wednesday, 13 September 2017

बच्चों तुम तकदीर हो कल ------- ?--? __-- ?---

   बच्चे  ही  किसी  देश  का  भविष्य  होते  हैं    लेकिन   जहाँ    छोटी  सी  उम्र  के  कोमल  बच्चों  को  मार  दिया  जाता  हो  ,  ऐसी  घटनाओं   से   अन्य  बच्चे    भयभीत  हों   और  भय  के  वातावरण  में  पल कर  युवा  हों   तो   वह  समाज  कैसा  होगा  ?  इसकी  कल्पना  की  जा  सकती  है  l
   दंड  का  भय  समाप्त  हो  जाये ,  अपराधियों  को  संरक्षण  देने  वाले  अनेक  ' आका '  हों    तो  ये  अपराध  कैसे  रुकेंगे  l   सर्वप्रथम  हमें  ऐसे  लोगों  को  ' जो   छुप  कर  निहत्थे   और  मासूम  बच्चों '   की   अमानवीय  तरीके  से   हत्या  करते  हैं ,  और  जो  इन्हें  पनाह  देते  हैं ,  उन्हें  एक ' नाम ' देना  पड़ेगा  क्योंकि  यह  केवल  हत्या  नहीं  है ,   देश  के  भविष्य  के  साथ  खिलवाड़  है   l 

Sunday, 10 September 2017

सुख - शान्ति से जीने का एक ही रास्ता ----- निष्काम कर्म

 प्रत्येक व्यक्ति  को  अपना  जीवन  अपने  लिए  सुन्दर  दुनिया  स्वयं  बनानी  पड़ती  है  l  सुख - शान्ति  से  वही   व्यक्ति  जीवन  जी  सकता  है  जिसके  पास  विवेक  हो  , सद्बुद्धि  हो  l  सद्बुद्धि  कहीं  बाजार  में  नहीं  मिलती  और  न  ही  इसे  कोई  सिखा  सकता  है  l   लोभ , लालच , स्वार्थ , ईर्ष्या, अहंकार , झूठ , बेईमानी , धोखा , अनैतिक  कार्य  जैसे  दुर्गुणों  को  त्यागने   का  प्रयास  करने   के  साथ    जब  कोई  निष्काम  कर्म  करता  है  ,  तब  धीरे - धीरे  उसके  ये  विकार  दूर  होते  है   और  निर्मल  मन  होने  पर  ईश्वर   की    कृपा  से  उसको  सद्बुद्धि  मिलती  है   l   सद्बुद्धि  न  होने  पर   संसार  के  सारे  वैभव  होने  पर  भी  व्यक्ति  अशांत  रहता  है  l  अपनी  दुर्बुद्धि  के  कारण  छोटी  सी  समस्या  को  बहुत  बड़ी  समस्या  बना  लेता  है   l
      इसलिए  जरुरी  है  कि  बचपन  से  ही  बच्चों  में  छोटे - छोटे  पुण्य  कार्य  करने  की   आदत  डाली  जाये  l  अधिकांश  लोग  कर्मकांड  को , पूजा -पाठ  को  ही   पुण्य  कार्य  समझते  हैं  ,  कोरे  कर्मकांड  का  कोई  प्रतिफल  नहीं  होता  l   छोटी  उम्र  से  ही  यदि  बच्चों  में  पक्षियों  को  दाना  देना ,  पुराने  वस्त्र  आदि  जरूरतमंद  को  देना   जैसे  पुण्य  कार्य   की   आदत  हो  जाये  तो  उसका  सकारात्मक  प्रभाव  पूरे  जीवन  पर  पड़ता  है   l  

Saturday, 9 September 2017

दंड का भय न होने से समाज में अशांति बढती है

    हमारे  आचार्य  , ऋषि - मुनि   का  कहना  था  कि   अपराधियों  को  कभी  माफी  नहीं  मिलनी  चाहिए   l  इसका  समाज  पर  बुरा  प्रभाव  पड़ता  है  ,  लोगों  में  दंड  का  भय  समाप्त  हो  जाता  है  l  
  आज  के  समय  में  लोग   बड़े - बड़े  अपराध  करते  हैं    और  समर्थ  लोगों  से  अपना  जुड़ाव   रख  कर  सजा  से   बच   जाते  हैं    l   यदि  पकडे  भी  गए   तो   जमानत  पर  छूट  गए   और  वर्षों  तक   खुले  घूमते  हैं ,  ठाठ - बाट  का  जीवन  जीते  हैं   l  उनके  सहारे   अनेक  लोगों  के  गैर - क़ानूनी  धन्धे  और  काले - कारनामे  चलते  हैं  l   ऐसे  में   अपराधियों  की  श्रंखला  बहुत  बड़ी  हो  जाती  है   l   

Wednesday, 6 September 2017

अशान्ति का कारण है ----- भय

   यह  भी  एक  आश्चर्य  है  कि  समाज  में  भयभीत  वे  लोग  होते  हैं   जिनके  पास  धन , पद - प्रतिष्ठा  सब  कुछ  होता  है   l  उन्हें  हर  वक्त  उसके  खोने  का  भय  सताता  रहता  है  l  रावण  के  पास  सोने   की   लंका   थी ,  शनि ,  राहु,  केतु  सब  उसके  वश  में  थे  लेकिन  वो  वनवासी  राम  से  भयभीत  था  l   ऐसे  ही  दुर्योधन  था ,  उसने  पांडवों  का  छल  से  राज्य  हड़प  लिया  , उन्हें  वनवास  दे  दिया   लेकिन  फिर  भी  वह  उनसे  भयभीत  था  ,  उन्हें  समाप्त  करने   की   नई- नई  चालें  चलता  था  l
  जब  तक  मनुष्य  में  अहंकार  का  दुर्गुण  है  ,  उसका  यह  भय  समाप्त  नहीं  होगा   l  जब  किसी  के  पास  थोड़ी  सी  भी  ताकत  आ  जाती  है  ,  चाहे  वह  किसी  छोटी  सी  संस्था   या  किसी  भी  छोटे - बड़े  क्षेत्र  में  हो  ,  यह  ताकत  उसे  अहंकारी  बना  देती  है   l  वह  चाहता  है  सब  उसके  हिसाब  से  चलें  l  अहंकारी  भीतर  से  बड़ा  कमजोर  होता  है  ,  उसे  हमेशा  अपनी  इस  ' ताकत '  के  खोने  का  भय  सताता  है  l  वह  नहीं  चाहता  कि  कोई  जागरूक  हो  जाये  ,  उसके  विरुद्ध  खड़ा  हो  l   अहंकारी  व्यक्ति  हमेशा  अपने  अहंकार   की   तुष्टि  का  प्रयास  करते  हैं  ,लेकिन  कभी  संतुष्ट  हो  नहीं  पाते  l  उनका  यह  अहंकार  स्वयं  उन्हें   भी   कचोटता  है   और समाज  में  अशांति  पैदा  करता  है  l 

Wednesday, 30 August 2017

धन - सम्पति की अधिकता बुराई की जड़ है

     धन - सम्पति  जरुरी  भी  है   लेकिन  इसकी  अधिकता  से   व्यक्ति  चाहे  कोई  भी  हो  उसमे  बुरी  आदतों  का  समावेश  होने  लगता  है  l   बहुत  कम  ऐसे  लोग  होते  हैं  जो  धन  का  सदुपयोग  करें , बुराइयों  से  बचे  रहें  l   आजकल  के  बाबा - बैरागियों  के  पास  अपार  सम्पदा  है ,  यह  सम्पदा देश - दुनिया  में  कहाँ  तक  फैली  है ,  इसका  आकलन  करना  कठिन  है  l  एक  सामान्य  व्यक्ति    के  पास   तो  देने  के  लिए  अपनी  आस्था  और  श्रद्धा  है  ,  वह  अपनी  मेहनत   की    कमाई  में  से  बहुत  कम  चढ़ावा  चढ़ा  पाता  है  ,  फिर   इन  बाबाओं  के  पास   करोड़ों   की   सम्पदा , इतना  वैभव     कहाँ  से  आता   है  l   जो  लोग  गलत  रास्ते  से  अपार  धन  कमाते  है ,  वे  ऐसे  बाबाओं  के  माध्यम  से  अपना  धन  ठिकाने  लगाते  हैं   l  इससे  उन्हें  दोहरा  लाभ  हो  जाता  है --- एक  तो  मन  का  अपराध - बोध  कुछ  कम  हो  जाता  है   और  दूसरा  वे  इनके  माध्यम  से  अपने  बड़े - बड़े ,  हर  तरह  के  स्वार्थ  सिद्ध  कर  लेते  हैं   l  अब  जरुरत  है  जागरूकता   की ,  अपनी  क्षमताओं  पर   और  उस  अज्ञात  शक्ति  पर  विश्वास  रखने  की   l 

Sunday, 27 August 2017

मानसिक गुलामी

     राजनैतिक  रूप  से  पराधीनता  से  मुक्त  होना  ही  पर्याप्त  नहीं  होता  l   वर्षों  गुलामी  भोगते - भोगते  यदि  हमारी  गुलाम  रहने  की  आदत  बन  चुकी  है   तो  हम  किसी  न  किसी  कि  गुलामी  करते  ही  रहेंगे  l  जिस  भी  व्यक्ति  के  पास  थोड़ी  भी  ताकत  होती  है  ,  वह  अपने  शक्ति - प्रदर्शन  के  लिए  लोगों  को  अपना  गुलाम  बना  लेता  है  l   युवा - वर्ग  में  सबसे  ज्यादा  ऊर्जा  होती  है  ,  जीवन  का  इतना  अनुभव  नहीं  होता  , अत:  यह  वर्ग    बड़ी  जल्दी   लोगों  के  बहकावे  में  आ  जाता  है  l  अपने ' आका ' के  कहने  पर ये  लोग  सड़कों  पर  नारे बाजी  कर  लें  ,  दंगे - फसाद  कर  लें  ,  तोड़ -फोड़  आदि  हिंसक  कारनामे  कर  लें    इन  लोगों  के  पास  सोचने - समझने   की    शक्ति  नहीं  होती   l  विवेक  न  होने  के  कारण  उनके  इशारों  पर  कठपुतली   की   तरह   नाचते  हैं  l    यह  स्थिति  छोटे - बड़े  हर  क्षेत्र  में  है  l
     इस मानसिक  गुलामी  से  तभी  मुक्ति  मिल  सकती  है   जब  बच्चों  को  शुरू  से  ही  परिश्रमी  और  स्वाभिमानी  बनाया  जायेगा  l  

Friday, 25 August 2017

धन और पद का लालच अशान्ति का कारण है

     जनसँख्या  के  एक  छोटे  से  भाग  के  पास  ही  धन , पद व  प्रतिष्ठा  होती  है   ,  यदि  इस  शक्ति  का  सदुपयोग  किया  जाता  है  तो  पूरे  समाज  का ,  जनसँख्या  के  एक  बड़े  भाग  का  कल्याण  होता  है    लेकिन  जब  इस  शक्ति  का  दुरूपयोग  होता  है ,  इन  लोगों  में   अपने  इस  ' सुख '  का  लालच  आ  जाता  है    तो  उसका  परिणाम  यह  होता  है   कि   धन  व  पद  के  ठेकेदार  तो  अपने  मजबूत  घरों  में  सुरक्षित  रहते  हैं ,  चैन  की   वंशी  बजाते   हैं    और  आम  जनता ,  जनसँख्या  का  एक  बड़ा  भाग    अराजकता  और  अव्यवस्था  में  पिसता   और  भयभीत    रहता     है  l
  जनता  को  अब  जागने  की  और  स्वाभिमान  से  जीने    की   जरुरत  है   l   आज  हर  व्यक्ति  स्वार्थी   हो  गया  है  ,   लोगों  को  सम्मोहित  कर  के ,  तरह - तरह  से  बेवकूफ  बनाकर  लोग  अपना  स्वार्थ  सिद्ध  करते  हैं  l  जब  लोग  अपनी  मेहनत,  अपने  ईमान  पर  भरोसा  करके  स्वाभिमान  से  जीना  सीखेंगे    तभी  शान्ति  होगी  l 

Tuesday, 22 August 2017

मानसिकता में परिवर्तन जरुरी है

         मनुष्य   के   जैसे  विचार  होते  हैं  वह  उसी  के  अनुरूप  कार्य  करता  है   l  जब  व्यक्ति  अपने  को  श्रेष्ठ   और   ताकतवर  समझता  है  ,  अहंकारी  होता  है   तब  वह  अपनी  हुकूमत  अपने  से  कमजोर  पर  चलाता  है  l  ऐसे  कमजोर  में  चाहे -- नारी  हो , अपने  कार्यस्थल  के  कर्मचारी  हों    या  अपने  ही  बच्चे  हों ,  --- वे  सबको  अपने  अनुशासन  में  चलाना  चाहते  हैं  l  ऐसी  ही  सोच  से  समाज  में  अत्याचार  बढ़ते  हैं  l  वक्त  के  साथ  अत्याचार  का  रूप  बदल  जाता  है  l   पहले  समाज  में  अनेक  कुप्रथाएं  थीं -- सती-प्रथा  थी ,  बाल -विवाह  थे  l  समाज - सुधारकों  के  अनेक  प्रयासों  से  यह  कुप्रथाएं  समाप्त  हुईं  तो  अब  दहेज़ -हत्या ,  कन्या -भ्रूण -हत्या  ,  बलात्कार  फिर  हत्या ----- !  
      केवल  नारी  ही  उत्पीड़ित  नहीं  है ,   ऐसे  अहंकारी  अपने  बच्चों  के  लिए  भी  घातक  हैं ,   अनेक  जो  उच्च  पदों  पर  होते  हैं ---डाक्टर , इंजीनियर, नेता  --- वे  अपने  बच्चों    की   रूचि  का  ध्यान  नहीं  रखते  ,  अपने  धन  और  पद  के  बल  पर   , उचित - अनुचित  हर  प्रयास  करके   उन्हें   अपनी  इच्छा  अनुसार  चलाना  चाहते  हैं ,  ताकि  समाज  में  उनकी ' झूठी  प्रतिष्ठा '  बनी  रहे ,  इसके  लिए  चाहे  बच्चे  कुर्बान  हो  जाएँ ,  उनकी  ' प्रतिष्ठा '  बनी  रहे  l
  समाज  में  सुधार   के  निरंतर  प्रयास  जरुरी  हैं ,  लेकिन  स्थायी  सुधार  तभी  होगा   जब  लोगों  के  ह्रदय  में  संवेदना  होगी ,  दूसरे  के  सुख - दुःख  को  अपना  समझेंगे  l  शक्ति  और  अहंकार  से  नहीं  ,  सद्गुणों  से  लोगों  का  ह्रदय  जीतेंगे  l 

Sunday, 20 August 2017

अशांति का मूल कारण ------ कर्तव्य की चोरी

  आज  की  सबसे  बड़ी  जरुरत  है ---- नैतिक  शिक्षा  l  लोगों  को  अपने  संस्कृतिक  मूल्यों  का  ज्ञान  हो ,  ह्रदय  में  संवेदना  हो  ,  पराये  दुःख  को  अपना  समझें ,  किसी  को  हानि  न  पहुंचाए ---- जब  तक  यह  सब  भावनाएं  व्यक्ति  में  नहीं  होंगी  ,  वह  ईमानदारी  से  अपना  कर्तव्यपालन  नहीं  करता  l   लोगों  को  जोर - जबरदस्ती  से  सच्चाई  के  रास्ते  पर  नहीं  चलाया  जा  सकता  l   जनता  में  अनुकरण  करने  की  प्रवृति  होती  है  ,  जैसा   आचरण  वे   धन , पद  और  सामर्थ्य  में  अपने  से   अधिक  ऊंचाई  वाले ,  बड़े  लोगों  का  देखती  है   वैसा  ही  अनुकरण  जनता  करती  है   l  पारिवारिक ,  सामाजिक  और  राजनैतिक  हर  क्षेत्र  में  यह  बात  लागू  होती  है  l   समाज  में   बहुत  बड़े  परिवर्तन  की  जरुरत  है   l   विभिन्न  क्षेत्रों  में  विभिन्न  पदों  पर  ऐसे  व्यक्ति  हों  जो  अपने  आचरण  से  शिक्षा  दें   l 

Friday, 18 August 2017

अस्तित्व के लिए संघर्ष

    समाज  में    तरह - तरह    भेद  होते  हैं ---- ऊँच-नीच ,  अमीर- गरीब  धर्म  के  आधार  पर  वर्ग  भेद   l  इन  सब  से  बढ़कर  एक  और  वर्ग  भेद   संसार  में   बहुत  समय  से  है  --- यह  योग्यता   के  आधार  पर है ---- योग्य  और  अयोग्य  l      जो  वास्तव  में    योग्य  है  ,  ईमानदारी  और  समर्पण  भाव  से  कार्य  करते  हैं  , वे  अपने  साथ  औरों  को  भी  आगे  बढ़ाते  हैं ,  इससे  पूरा  समाज  और  राष्ट्र  तरक्की  करता  है  l
     लेकिन  जब  किसी  समाज  में  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  होता  है   तब  अयोग्य  व्यक्ति   बड़ी   मजबूती  से  संगठित  हो  जाते  हैं   l  अपने  अस्तित्व  को  बनाये  रखने  के  लिए   वे  ऐसा  ताना - बाना  बुनते  हैं  कि  किसी  की  योग्यता  से  समाज  परिचित  ही  न  हो  पाए l   क्योंकि  यदि  योग्य  व्यक्ति  सामने  आ  गया  तो  उनकी   अयोग्यता    जग - जाहिर  हो  जाएगी  l   संगठित  होना   ऐसे  लोगों  की  मज़बूरी  है  l   मनुष्यों  में  यह  कछुआ  प्रवृति  होती  है ,  कोई  आगे  बड़े   तो  उसकी  टांग  खींच  लेते  हैं  l    ऐसे  लोगों  की  वजह  से  ही  समाज  में  अशांति ,  अपराध , भ्रष्टाचार  बढ़ता  है  l
    ऐसी  स्थिति  से  निपटने  के  लिए  जरुरी  है  कि  सच्चाई  और  ईमानदारी  से  कार्य  करने  वाले  अपने  कर्तव्य - पथ  पर  डटे  रहें ,  संगठित  हों ,  पलायन  न  करें   l  हर  रात्रि  के  बाद  सुबह  अवश्य  होती  है  l 

Tuesday, 15 August 2017

जागरूकता जरुरी है

    लोगों  को  अपना  गुलाम  बनाना ,  उनका  शोषण  करना ,   अन्याय , अत्याचार  करना ,  नारी  जाति  को  उत्पीड़ित  करना  ----- यह  हर  उस  व्यक्ति  की  प्रवृति  है  जिसके  पास  थोड़ी  भी  ताकत  है  l    यदि   दंड  का  भय  न  हो  तो   समाज  में  कायरता  बढ़  जाती  है   l  समाज  में  सारे  उत्पीड़न  का  दायित्व  कायर  लोगों  पर  है  ,  कायरता  इस  समाज  का  सबसे  बड़ा  कलंक  है  l  इसी  वजह  से  हम  सदियों  तक  गुलाम  रहे  l  राजनैतिक  रूप  से  चाहे  हम  आजाद  हो  गए  हों  ,  पर  शोषण , अत्याचार , अन्याय  समाप्त  नहीं  हुआ  l  अत्याचारी  के  चेहरे  बदल  गए  ,  नये  कलाकार  आ  गये  l
  सही  मायने  में  हम  तभी  आजाद  होंगे  जब  लोगों  की  दुष्प्रवृत्तियों  पर  अंकुश  होगा  l    दुष्प्रवृत्तियों  का  अंधकार  बहुत  सघन  है  ,  जनता  अपना  रोल -माँडल  किसे  चुने   ?

Friday, 11 August 2017

ऐसी शिक्षण संस्थाएं खुलें जो लोगों को जीना सिखाएं

  आज  की  सबसे  बड़ी  समस्या  है  कि  लोगों  को  जीना  नहीं  आता   l     गरीब   के  जीवन  में  विभिन्न  परेशानी  आती  हैं  तो  अपनी  गरीबी  के  साथ  वह  उन्हें  भी  झेल  लेता  है   और  अपने   सीमित  साधनों  में  तीज - त्योहार  आदि  अवसर  पर  अपने  परिवार  और  अपने  समाज  के  साथ  खुशियाँ  भी  मना  लेता  है  l  कष्ट  कठिनाइयों  में  रहने  से  उसकी  संघर्ष  क्षमता  विकसित  हो  जाती  है  l
  लेकिन  जो  लोग   सुख - सुविधाओं  में  रहते हैं ,  आरामतलबी  का  जीवन  जीते  हैं  ,  उनकी   श्रम  करने  की  आदत  नहीं   होती    l  थोड़ी  सी  परेशानी  भी  उन्हें  विचलित  कर  देती  है   l
  शिक्षा  ऐसी  हो  जो  व्यक्ति  को  श्रम  करना ,  कर्तव्य  पालन  करना ,  ईमानदारी  और  सच्चाई  से  रहना  सिखाये  l    लोग  थोडा  सा  धन - वैभव  और  किताबी  ज्ञान  होने  से  अहंकारी  हो  जाते  है  ,  उनके  पैर  जमीन  पर  नहीं  पड़ते   l  ऐसे  लोगों  का  अहंकार  सम्पूर्ण  समाज  के  लिए  घातक  हो  जाता  है  l
  नम्रता ,  करुणा ,  संवेदना ,  परोपकार   जैसी  भावनाएं   जब  जीवन  की  शुरुआत  से  ही  बच्चों  को  सिखाई  जाएँगी   तभी  एक  स्वस्थ , सुन्दर समाज  होगा  l   इन  भावनाओं  के   अभाव  में  व्यक्ति  निर्दयी  हो  जाता  है  l 

Tuesday, 8 August 2017

आचरण से शिक्षा दें -----

  प्रवचनों  का  , उपदेशों  का  लोगों  पर  कोई  विशेष  प्रभाव  तब  तक  नहीं  पड़ता   जब  तक     उपदेश  देने  वाला  स्वयं  उन  बातों  को  अपने  आचरण  में  नहीं   उतारता  l  जब  कोई  व्यक्ति  स्वयं  श्रेष्ठ  आचरण  करता  है  और  फिर  वैसा  ही  श्रेष्ठ  आचरण  करने  का  लोगों  को  उपदेश  देता  है  तो  उसकी  वाणी  में  प्राण  आ  जाते  है  और  उसकी  कही  हुई  बात  श्रोताओं  के  ह्रदय  में    उतर  जाती  है  और  वे  उसकी  बताई  राह  पर  चलने  लगते  हैं  l  ऐसे  लोग  आज  बहुत  कम  हैं   l    धन  की  चकाचौंध  ने  व्यक्ति  को  दोरंगा  बना  दिया  l  परदे  के  सामने  कुछ  है  और  परदे  के  पीछे  कुछ  और  है   l  चाहे  पारिवारिक  जीवन  हो ,  सामाजिक  या  राजनीतिक,    यह  खोखलापन  सब  जगह  है   l  बूढ़े  होते  लोग  भी   अपनी  कामना ,  वासना ,  लोभ ,  लालच  का  त्याग  नहीं  कर  पाते  ,   तो  वे  समाज  को  क्या  शिक्षा  देंगे  ?  कौन  सा  आदर्श  प्रस्तुत  करेंगे  ?    प्रकृति  ने  ऐसी  व्यवस्था  की  है  कि    मृत्यु  होने  पर  कोई  अपने  साथ  कुछ  नहीं  ले  जा  सकता ,  अन्यथा  आज  का  मनुष्य   सारा  धन - वैभव   अपने  साथ  बाँध  कर  ले  जाता  l 

Wednesday, 2 August 2017

अति स्वार्थ के कारण व्यक्ति नीचे गिरता चला जाता है

   मनुष्य  पर  स्वार्थ  हावी  हो  जाता  है ,  कहते  हैं  मनुष्य    स्वार्थ  में  अन्धा  हो  जाता  है  l  ऐसा  व्यक्ति  किसी  भी  स्तर  तक  नीचे  गिर  सकता  है  l   जिन्दगी  में  जब  ऐसे  व्यक्तियों  से  सामना  हो   तब  हमें  अपना  आत्मविश्वास    बनाये  रखना  चाहिए  l    लोग  क्या  कहते  हैं , समाज  क्या  कहता  है  ?  यह  सब  सोचकर  अपने  मन  को  नहीं  गिरने  देना  हैअ  सही  है    l  यदि  हमारे  जीवन  की   दिशा  सही  है   तो  रास्ते  की  सभी  बाधाएं  हट  जाएँगी ,        '  जीत  हमेशा  सत्य  की  होती  है  l '

Monday, 31 July 2017

धन का लालच और असीमित इच्छाओं के कारण वीरता और स्वाभिमान जैसे गुण लुप्त हो रहे हैं

अति  महत्वाकांक्षा  और  बढ़ती  हुई  तृष्णा  ने  मनुष्य  की  कायरता  में  वृद्धि  की  है  l  अपने  से  कमजोर को  संरक्षण  देने  के  बजाय  व्यक्ति  उसे  लूटने  में ,  उसे  गलत  दिशा  दिखाने  में  तत्पर  रहता  है  ताकि  वे  समर्थ  होकर  उसकी  बराबरी  में  न  आ  जाये  l  ' स्वाभिमान '  जैसा   गुण  जिससे   व्यक्ति  और  समाज  गर्व  से  सिर  उठाकर  रहते  हैं  ,  मिलना  बड़ा  मुश्किल  हो  गया  है  l  लोगों  का  दोहरा  व्यक्तित्व  है  l  बढ़ती  हुई  कामनाओं  और  वासना  की  पूर्ति  के  लिए  लोग  अपनी  आत्मा  को  बेच  देते  हैं  l  ऐसे  ही  लोग  समाज  में  अपने  अस्तित्व  को  बनाये  रखने  के  लिए  अत्याचार  और  अन्याय  का  सहारा  लेते  हैं  ,  इस  वजह  से  समाज  में  अशान्ति  बढ़ती  है  l 

Monday, 24 July 2017

अत्याचारी को पहचानना कठिन है

 एक  जमाना  था  -- जब  डाकू   होते  थे  ,  पहले  से  ही  घोषणा  कर  के  डाके  डालने  आया  करते  थे  l  उनका  भी  ईमान  था , धर्म  था ,  देवी  के  भक्त  थे    और  समाज  से  बाहर  बीहड़ों  में  रहते  थे  l  लेकिन  अब   भ्रष्टाचार   के  युग   ने  सब  पर  लीपापोती  कर  दी   l  अब  तो  अपराधी  शराफत  का  नकाब  पहन  कर  समाज  में  सब  के  साथ  हिल -मिल  कर  रहता  है  l  विज्ञान  के  युग  में  लोगों  के  पास  दूसरों  का  शोषण  करने  के  बहुत  हथकंडे  हैं  l  थोड़े  बहुत  अपराध  तो  हर  युग  में  होते  रहे  हैं ,  लेकिन  तब  लोग  अपराधियों  को  , गुंडों  को  अपने  समाज  , अपनी  जाति  से  बहिष्कृत  कर  देते  थे   l  आज  की  स्थिति  में  यदि  किसी  तरह  अपराधी  पकड़  भी  जाये   तो  सबूत , गवाह ----- आदि  लम्बी  प्रक्रिया  से  वर्षों  खुला  घूमता  है  और  अपने  जैसे  अनेक  अपराधी  तैयार  करता  है   l   आज  समाज  की  अधिकांश  समस्याएं   बुद्धि  भ्रष्ट  होने  से ,  सद्बुद्धि  की  कमी  से  उत्पन्न  हुई  हैं   l  स्वतंत्रता  से पूर्व  ,  देश  की  आजादी  के  लिए  लोगों  को  जागरूक  करने  के  लिए   जो    देशभक्त   भाषण  देते , लेख  लिखते ,  अपनी  जान  जोखिम  में  डालते  उन्हें  अति  कठोर  जेल , काले  पानी  की  सजा ,  असहनीय  कष्ट  दिया  जाता  था    लेकिन   अब   मासूम  बच्चियों  से  बलात्कार  करने  वाले ,  छोटे  बच्चों  का  अपहरण  कर   उन्हें  सताने  वाले ,  बड़े - बड़े  अपराध  करने  वाले   समाज  में   खुले  घूमते  हैं  l    आज  जरुरत  है  -- ऐसे  लोगों  की  जिनके  पास  सद्बुद्धि  हो , विवेक  हो   जो  जाति  व  धर्म  के  आधार  पर  लोगों  को  न  बांटे  l  ऐसा  भेद  हो  जिसमे  एक   ओर  ईमानदार,  सच्चे  और  नेक  दिल  वाले  लोग  हों   और  दूसरी  तरफ  समाज  को  अंधकार  में  ले  जाने  वाले   अपराधी ,  अत्याचारी , अन्यायी  हों   l  इस  अंधकार  तरफ  के  लोगों  को  कठोर  सजा  भी  हो  और  सुधरने  का   प्रयास  भी  हो  तभी  एक  सुन्दर  समाज  का  निर्माण  हो  सकता  है  l 

Saturday, 22 July 2017

अशान्ति इसलिए है क्योंकि लोग अत्याचार को चुपचाप सहन करते हैं

  नैतिकता और  मानवीय  मूल्यों  का  ज्ञान  न  होने  से   जो  समर्थ  हैं ,  जिनके  पास  धन  और  पद  की  ताकत  है ,  वे  अपनी  शक्ति  का  सदुपयोग  नहीं  करते  l  अपने  अहंकार  में  ,  शक्ति  के  मद  में  वे  कमजोर  पर  अत्याचार  करते  हैं  l  कहते  हैं  अत्याचार  में  भी  एक  नशा  होता  है  ,  यदि  अत्याचार  को  सहन  किया  जाये  तो  वह  धीरे - धीरे  बढ़ता  जाता  है ,  संगठित  हो  जाता  है   और  अपने  विरुद्ध  उठने  वाली  हर  आवाज  को  बंद  कर  देता  है  l
  समस्या  इसलिए  बढ़ती  जाती  है  --- यदि  छोटे बच्चे - बच्चियों  पर अत्याचार हुआ ,  उन्हें  तरह -तरह  से  सताया  गया ,  तो  वे  बेचारे  छोटे  हैं , ऐसे  आतताइयों  का  मुकाबला  कैसे  करेंगे  ? समाज  के  गरीब , कमजोर  लोगों   का  शोषण  हो , विभिन्न  संस्थाओं  में  उत्पीड़न  हो   तो  अकेला  उत्पीड़ित  व्यक्ति    कैसे   मुकाबला  करे  ?   सबसे  बड़ी  गलती  समाज  के  उस  वर्ग  की  है    जो  धन  के  लालच में ,  कुछ  सुविधाओं  के  लिए   और  सबसे  बढ़कर  अपने  चेहरे  पर  जो  शराफत  का  नकाब   है  उसे  बचाने  के  लिए  वे  अत्याचारियों  का  साथ  देते  हैं ,   उनकी  मदद  करते   हैं  , उनका  साथ  दे  कर  उन्हें  मजबूत  बनाते  हैं  l
  आज    अच्छाई  को  ,  सत्य  को  संगठित  होने  की  जरुरत  है   l   यश  प्राप्त  करने  की  कामना  को  त्याग  कर   जब  सुख-शांतिपूर्ण  समाज  व्यवस्था  की  चाह  रखने  वाले  लोग  संगठित  होंगे ,  जियो  और  जीने  दो ,    हम  सब  एक  माला  के  मोती  हैं --- इस  विचारधारा  के  लोग  संगठित  होंगे ,  अत्याचार  के  विरुद्ध  तुरन्त  संगठित  होकर  खड़े  होंगे    तभी  समाज  से  नशा , जीव हत्या ,  अत्याचार - अन्याय    समाप्त  हो  सकेगा   l 

Friday, 21 July 2017

अशांति इसलिए है क्योंकि मनुष्य स्वयं सुधरने के बजाय दूसरों को अपने मन के अनुकूल बनाना चाहता है

 संसार  में  अधिकांश  समस्याएं  इसलिए  उत्पन्न  होती  हैं  क्योंकि   जिसके  पास  धन , पद  आदि  की  ताकत  है   वह  चाहता  है  कि  दूसरे  उसके  अनुसार  चले   l  अशान्ति  तब  होती  है  जब  समर्थ  लोग  गरीबों , मजदूर,  किसानों  और  हर  तरह  से  कमजोर  लोगों  का  शोषण  करते  हैं  और  चाहते  हैं  वो  इसी  तरह  शोषित  होता  रहे ,  एक  शब्द  भी  न  बोले  ताकि ' उनका ' वैभव - विलास  चलता  रहे   l   ऐसे  लोगों  की  आड़  में   कितने  ही  ' दबंग ' समाज  में  तैयार  हो  जाते  हैं  जिन्हें  कानून  का  भय  नहीं  होता , उनमे  कोई  नैतिकता  नहीं  होती ,  दो  पैर  के  पशु  समान  होते  हैं  l  ऐसे  में  समाज  की  नयी  पीढ़ी  भी  सुरक्षित  नहीं  है  l  लोगों  की  सोच  बहुत  संकुचित  हो  गई  है  l  आज  जरुरत  है  ऐसे  विचारशील  लोगों  की  जो   अपनेश्रेष्ठ  आचरण  से  लोगों  को  जीना  सिखाएं  l   

Sunday, 16 July 2017

जिनके मन में अशान्ति है वही इस संसार में अशान्ति फैलाते हैं

  ' अशान्ति  भी  संक्रामक  रोग  की  तरह  है  ,  अशान्त  मन - मस्तिष्क  के  व्यक्ति  अपने  क्रिया - कलापों  से   आसपास  के  लोगों  को  अशांत  करते  हैं  और  इस  तरह  अशान्ति  का  क्षेत्र  बढ़ता  जाता  है  l
   पशु - पक्षियों  को  देखें   तो  वे  अपने  समुदाय  में  शान्ति  से  रहते  हैं ,  ईर्ष्या, द्वेष , अहंकार  जैसी  कोई  दुष्प्रवृत्ति  नहीं  है ,  मनुष्यों  से  उनकी  शांति  देखी  नहीं  जाती   इसलिए  मानव  समाज   बेजान  पशु - पक्षी   को  भी  चैन  से  जीने  नहीं  देता  l  मानव  समाज  में  भी   पुरुष  और  नारी  है  l  संसार  का  कोई  भी  देश  हो ,  कोई  भी  धर्म  हो   सभी  में  पुरुषों  ने  अपने  अहंकार  और  शक्ति  के  मद  में  नारी  पर  अत्याचार  किये  है  l
  संसार  में  जितने  बड़े - बड़े  युद्ध  हुए  वे  सब  पुरुषों  के  अहंकार  की  वजह  से  हुए    लेकिन  उसके  घातक  परिणाम   स्त्रियों  और  बच्चों  को  भोगने  पड़े   l  पुरुष  वर्ग   अपने  बेवजह  के  अहंकार  को  कम  कर  ले  ,  अपने  मन   को  शांत  रखे   तो    संसार    में  भी  शान्ति  रहे  l   आज  सबसे  बड़ी  जरुरत  है  ---- मन  की  शान्ति  l    जब  शांत   मन  के  लोग  अधिक  होंगे  ,  लोगों  में  सद्बुद्धि  होगी , विवेक  जाग्रत  होगा  तभी  शान्ति  होगी  l 

Saturday, 15 July 2017

धन का स्रोत क्या है ?

     मनुष्य  का  पारिवारिक  जीवन  कैसा  है  ?  समाज   में    शांति  है  अथवा  नहीं ,  लोगों  का  चरित्र  कैसा  है  आदि  बहुत  सी  बातें  इस  बात  पर  निर्भर  करती  हैं  किउनके  परिवार  में  धन  किस  तरह  आता  है  l
  जिन  परिवारों  में  बेईमानी  , भ्रष्टाचार  से  धन  आता  है   वहां  बीमारी ,  चारित्रिक  पतन   आदि  की  वजह  से  अशांति  रहती  है  l  
  यदि  लोगों  को  बिना  मेहनत  के  धन  मिल  जाये   जैसे  अनेक  लोग  ,  संस्थाएं   दान  के  नाम  पर ,  निष्काम  कर्म  के  नाम  पर   निर्धन  लोगों  को  विभिन्न सहायता  देते  हैं   l  दान - पुण्य  के  कार्य  करना  अच्छी  बात  है   लेकिन  हमारे  शास्त्रों  में  लिखा  है ---- किसी  को  आलसी  बना  देना ,   बहुत  बड़ा  पाप  है   l   कहते  हैं  '  खाली   मन  शैतान  का  घर '  l   जिस  समाज  में  ऐसे  आलसी लोग  ,  जिन्हें  बिना  श्रम  के  धन ,  सुविधाएँ  मिल  जाती  हैं  --- तो  ऐसे  समाज  में   विकास  रुक  जाता  है  ,  लोग  अपनी  उर्जा  का  उपयोग  नकारात्मक  कार्यों  में  करने  लगते  हैं  ,  समाज  में  अपराध , अराजकता  बढ़ने  लगती  है   जो  सबके  लिए  घातक  है  l   समाज  में  सुख  शांति  के  लिए  जरुरी  है   कि  लोगों  को  आत्म  निर्भर  बनाया  जाये ,  वो  अपनी  रोटी  स्वयं  कमा  कर  खा  लें  l   भिखारियों  को  भी  पुरुषार्थी  बनाया  जाये  l    केवल  वृद्ध  और  हर  तरह  से  असमर्थ  को  ही    भोजन   आदि  दिया  जाये   l  l 

Monday, 3 July 2017

जागरूकता का अभाव

  समाज  में  अशांति  का  सबसे  बड़ा  कारण  है ---- लोग  जागरूक  नहीं  हैं  l  अपने  आप  परिस्थितियों  से  ठोकर  खा कर  जागरूक  होने  में  जीवन  का  बहुत  बड़ा  हिस्सा  खप  जाता  है  l  सच्चाई  यह  है  कि  आज  लोग  दूसरों  को  बेवकूफ  बना कर  ही  पैसा  कमा  रहें   हैं ,  पद , शोहरत , वैभव  सब  तभी  तक  है  जब  तक  दूसरा   बेवकूफ  है  l   धर्म , शिक्षा ,  राजनीति,  चिकित्सा -------- कोई  भी  क्षेत्र  ऐसा नहीं  बचा  जहाँ  ईमानदारी  और  कर्तव्यपालन  हो  l  लोग  गरीब  और  कमजोर  को  जागरूक  करना  चाहते  भी  नहीं  अन्यथा  बहुतों  की  रोटी -रोजी  छिन  जाएगी  l   जो  गरीब  है , हर  तरह  से  कमजोर  है  उसी  को  सब  मिलकर  लूटते  हैं  ---- धार्मिक  कर्मकांडी  उसे  भाग्य  अच्छा  करने  के  लिए   तरह -तरह   की  पूजा , कर्मकांड  बताकर  पैसा  ऐंठते  हैं  ,  शिक्षा  के  क्षेत्र  में  उसे  प्रश्न -उत्तर  रटा  दिए , व्यवहारिक  ज्ञान  नहीं  हुआ ,   बीमार  हो  जाये  तो  चिकित्सक  छोटी  सी  बीमारी  को  बड़ा  बताकर ,  तरह - तरह  की  जांच करा  के  खूब  लूटते  हैं ,  कहीं  अपनी  समस्या  को  हल  कराने  के  लिए  जाये   तो  जो  उसका  बचा - खुचा   है , वह  भी  समाप्त  !
  हमारे  शास्त्रों  में ,  धर्म ग्रन्थों  में  कहा  भी  गया  है   गरीब  को , कमजोर  को  मत  सताओ ,  गरीब  की
 ' हाय '   बहुत  बुरी  होती  है  l     समाज  में  एक  वर्ग  सुख - वैभव  में  रहे  और  दूसरे  वर्ग  को  दिन - रात  मेहनत - मजदूरी  करने  पर  भी  दो  वक्त  भोजन   नसीब  न  हो   तो  अशान्ति  तो    होगी  l 

Thursday, 29 June 2017

जियो और जीने दो

 यदि  व्यक्ति  स्वयं  शान्ति  से  रहे  और  दूसरों  को  भी  चैन  से  जीने  दे  तो  सब  तरफ  शांति  रहे  लेकिन  आज  ऐसे  लोगों  की  अधिकता है  जो  दूसरों  को  चैन  से  जीने  नहीं  देते  l  जिनका  चैन  छीना  जाता  है   इसके  पीछे  प्रमुख  वजह -- अत्याचारी  का  अहंकार  है  l  अहंकारी  सोचता  है  की  वो  बिलकुल  सही  है ,  ऐसे  व्यक्ति  परिवार , समाज , संस्था  सबको  अपने  ढंग  से  चलाना  चाहते  हैं  जिससे  सब  दब  कर  रहें  और  उनके  स्वार्थ  व  अहंकार  की  तुष्टि  होती  रहे  l  भौतिकता  में  वृद्धि  के  कारण  अत्याचार  का  तरीका  भी  बदल  गया  है  l  अब  लोग  दूसरों  की  हंसी  उड़ा  कर , उन्हें  नीचा दिखाकर , षडयंत्र  कर  उन्हें  किसी  जाल  में  फंसाकर ब्लैकमेल  करके  ,  कमजोर  का  हक  छीनकर  अपनी  शक्ति  को  दिखाते  हैं  l  ऐसे  मानसिक  उत्पीड़न  की  प्रतिक्रिया  बड़ी  भयानक  होती  है  l  बदले  की  आग  जब  ह्रदय  में  पैदा  होती  है  तो  वह  अच्छा - बुरा नहीं  देखती   सबको  जला  देती  है  l   यह  संसार  बहुत  बड़ा  है   इसमें  ऐसे  एक -दो  व्यक्ति  ही  होंगे  जो  अत्याचार और  उत्पीड़न  की  प्रतिक्रिया स्वरुप  महामानव  बन  जाएँ  l
     जो  गरीब  है , शोषित है , उत्पीड़ित  है   , वह  तो  वैसे  ही  परेशान  है  ,  समाज  में  शांति  के  लिए  जरुरी  है  जिनके  पास   धन , पद , वैभव  की  शक्ति  है   वे  सुधरें  और  अपनी  इस  शक्ति  का,  विभूति  का  उपयोग  जन कल्याण के  लिए  करें ,  लोगों  का  शोषण  करने   के   स्थान  पर  उन्हें  आत्मनिर्भर  बना  कर  उन्हें  भी   सुख  शांति  से  जीने  दें     

Friday, 23 June 2017

सुख - साधनों ने व्यक्ति को आलसी बना दिया

   विकास  के  लिए  वैज्ञानिक  आविष्कार  जरुरी  हैं   लेकिन  इन  आविष्कारों  में  जो   शरीर  को  आराम  देने  वाले  हैं  उनके  अधिक  उपयोग  से  मनुष्य  आलसी  हो  गया  है  l  शारीरिक  श्रम  न  करने  से  अनेक  बीमारियाँ  घेरती  हैं  l  घर  हो ,  ऑफिस हो  या  कोई  कम्पनी  हो   , तकनीकी  सुविधाओं  से  जब  लोग  अपना  काम  जल्दी  कर  के  फालतू  हो  जाते  हैं   तो  उनका  समय  व्यर्थ  की  बातों  में ,  नकारात्मक  कार्यों  में  बीतता  है  l कहा  भी  जाता  है --' खाली  मन  शैतान  का  घर  l '    इसलिए  लोगों  को  स्वयं  जागरूक  होना  पड़ेगा  कि  वे  अपने  फालतू  समय   में   व्यर्थ  की   बातों  में  अपनी  ऊर्जा  न  गंवाकर  ,  कुछ  समय  मौन  रहकर  श्रेष्ठ  चिंतन  करें  l  कोई  सकारात्मक  कार्य  करें ,  सत्साहित्य  पढ़ने  की  व्यवस्था  हो  l  ऐसा  होने  से  लोगों  का  मन  शांत  रहेगा ,  इससे  धीरे - धीरे  परिवार  और  समाज  में  भी  शांति  रहेगी  

Wednesday, 21 June 2017

तन के साथ मन का स्वस्थ होना भी जरुरी है

 मनुष्य  के  सारे  प्रयास  शरीर  को  स्वस्थ  रखने  के  लिए  होते  हैं  ,  मन  को  स्वस्थ  और   परिष्कृत  करने  का  कोई  प्रयास  मनुष्य  नहीं  करता   l    काम , क्रोध , लोभ   , ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ    जिसके  मन  में  है  वह  न  तो  खुद  शान्ति  से  रहता  है   और  न  और  किसी  को  शान्ति  से  जीने  देता  है  l  एक  व्यक्ति  जो  क्रोधी  है , अहंकारी  है  , तो  उसका  यह  दुर्गुण  परिवार , समाज  सब  जगह  अशान्ति  उत्पन्न  करता  है  l  जिसे  सिगरेट   आदि  नशे  की  लत  है  वह  समाज  में  कोई  सकारात्मक  योगदान  नहीं  देते  वरन  अपने  जैसे  पचास  और  नशेड़ी  तैयार  कर  लेते  हैं   l  इसी  प्रकार  जो  लोभी  है  , लालची  है   वह  अपने  साथ  बेईमानों  की  पूरी  श्रंखला  तैयार  कर  लेता  है  l  ऐसे  दुष्प्रवृत्तियों  वाले  लोगों  की  अधिकता  से  ही  दंगे , अपराध , लूटमार   होते  हैं   l   आज  जरुरत  है  कि  पूरी  दुनिया  में  ऐसी  संस्थाएं  हों  जो  लोगों  को  ईमानदारी , सच्चाई , संवेदना , ईश्वरविश्वास  , धैर्य , कर्तव्यपालन  जैसे  सद्गुण सिखाएं और   क्रोध ,  लालच , ईर्ष्या-द्वेष  जैसे  दुर्गुणों  को  त्यागना ,  आदि    की  शिक्षा  देकर  ' नैतिकता ' में  बड़ी -बड़ी  डिग्री  दें    l   इन  सब  के  साथ   जरुरी  है   लोग  आलस  को  त्यागे ,  कर्मयोगी  बने  l 

Tuesday, 20 June 2017

आत्मविश्वास जरुरी है

   जीवन  में  सफलता  के  लिए  आत्मविश्वास  जरुरी  है  l  अनेक  लोग  ऐसे  होते  हैं  जो  संघर्ष  कर के  जीवन  में  आगे  बढ़ते  हैं ,  सफल  भी  होते  हैं लेकिन  आत्मविश्वास  की  कमी  के  कारण वे  हमेशा  अपने  से  पद  व धन -सम्पन्नता  में  बड़े  व्यक्ति  की  चापलूसी  करते  रहते  हैं ,  उनके  सब  कार्य  उस  व्यक्ति  को  खुश  करने  के  लिए  होते  हैं   l इसलिए  उनसे  कोई  लोक कल्याण नहीं  हो  पाता  l   अति  चापलूसी  से  व्यक्तित्व  भी  प्रभावशाली  नहीं  रह  जाता  l  सर्वप्रथम  हमें  अपनी  योग्यता  पर  विश्वास  होना  चाहिए ,  अहंकार  नहीं  l   हमारा  प्रत्येक  कार्य  किसी  व्यक्ति विशेष  को  खुश  करने  के  लिए  नहीं ,  ईश्वर  को  प्रसन्न  करने  के  लिए  होना  चाहिए  l  ईश्वर  को  प्रसन्न  करने  के  लिए  जब  ईमानदारी , सच्चाई और  मनोयोग  से  जब  हम  कोई  छोटा  सा  काम  भी  करते  हैं  तो  वह  पूजा  बन  जाता  है   जिससे  आगे  सफलता  के  रास्ते  खुलते  जाते  हैं  l 

Monday, 19 June 2017

शांति कैसे हो ? जब लोग स्वयं को सुधारना ही नहीं चाहते

  संसार  में  अच्छे  लोग  भी  हैं   लेकिन  उनकी  संख्या  कम  है  और   वे  बिखरे  हुए  हैं   l  अधिकांश  लोग  अहंकारी  हैं  ,  जो  सिर्फ  अपनी  हुकूमत चलाना  चाहते  हैं   जिन्हें  लोगों  के  हित  से  कोई  मतलब  नहीं  है  ,  केवल  उनका  स्वार्थ  पूरा  होना  चाहिए  l   ऐसे  लोग  बदलना  नहीं  चाहते  l  अहंकार  की  वजह  से  स्वयं  को  गलत  समझते  ही  नहीं  हैं  तो   सुधार    कैसे  हो  ?  जब  अच्छाई  संगठित  हो  उसका  प्रभाव  जन -मानस  पर  पड़े  तभी  शांति  संभव  है   l 

Friday, 16 June 2017

सुख शान्ति से जीने के लिए हमें आध्यात्मिक होना होगा l

  अध्यात्म  का  अर्थ -  जीवन  से  भागना  नहीं  है , संन्यासी बनना  नहीं  है l   अध्यात्म  का  अर्थ है -- अपने  अवगुणों  को  पहचानकर  उन्हें  दूर  करना , सद्गुणों  को  अपनाना , कार्य  को  कुशलता  से  करना l  कुशलता  का  मतलब  चालाकी  नहीं  l   कर्तव्य  पालन  ईमानदारी  से  हो  तो  संसार  की  अधिकांश  समस्याएं  हल  हो  जाएँ  l  योग  की  विभिन्न  क्रियाओं  से  लाभ  प्राप्त  करने  के  लिए  मन  का  परिष्कार  जरुरी  है   l
  यदि  मन  में  छल - कपट , ईर्ष्या-द्वेष  है ,  हमारा  मन  दूसरों  को  धोखा देने , उन्हें नीचा  दिखाने,  उनका हक  छीनने  में  लगा  है   तो  सारी  बाहरी  क्रियाएं  व्यर्थ  हैं  l  तरह  तरह  के  आसन  कर के  भी  चेहरा मलिन  रहेगा  l आध्यात्मिक  क्षेत्र  में  कोई  प्रगति  नहीं  हो  सकेगी  l  मन  का  परिष्कार  ही  अध्यात्म  है  l 

Wednesday, 14 June 2017

सुख शान्ति से जीने के लिए संवेदना की जरुरत है

संवेदना  न  होने  से   परिवार  टूट  रहे  हैं  , अत्याचार  और  अन्याय  बढ़ा  है  l  पहले  छोटी - छोटी  रियासते  थीं ,  तो  यह  स्पष्ट  था  कि  वहीँ  के  शक्तिशाली  कमजोर  पर  अत्याचार  कर  रहे  हैं   l  अब  वैश्विकरण  का   युग  है  ,  बाजार  की  तरह  अत्याचार , अन्याय , भ्रष्टाचार  और  अपराध ---- यह  सब  भी  वैश्विक  स्तर  पर  है  l    आज  इंटरनेट  के  युग  में  यह  समझना  बहुत  कठिन  है   कि  सामने  जो  अपराध  या  अत्याचार  कर  रहा  है     उसकी  डोर  किस  के  हाथ  में  है ,  अपनी  कमजोरियों  के  कारण  वह  किसके  इशारों  पर  काम  कर  रहा  है  l   आज  की  सबसे  बड़ी  जरुरत  है  --हम  अपना  आत्मिक  बल  बढ़ाएं   l  नि:स्वार्थ  भाव  से ,  ईमानदारी  से   कर्तव्य  पालन   करना   ही  एक  तपस्या  है  l  ऐसा  कर  के   शान्ति     से  रहा   जा      सकता  है    है   

संसार में सुख - शांति के लिए जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना अनिवार्य है

   नारी  और  पुरुष  एक  ही  गाड़ी   के  दो  पहिये  हैं  ,  एक  पहिया  अच्छा  हो  और  दूसरा  पंक्चर  हो  तो  गाड़ी  नहीं  चलेगी  l  इसी  तरह  नारी  और  पुरुष  में  से  एक  वर्ग  सन्मार्ग  पर  चले  और  दूसरा  स्वेच्छाचारी  हो  तो  समाज  का  सही  ढंग  से  विकास  नहीं  हो  सकता  l   सबसे  बड़ी  जरुरत  यही  है   कि  नारी  और  पुरुष  दोनों  ही    सद्गुणों को  अपने    जीवन  में अपनाएं  तभी  वे  आने  वाली   पीढ़ी  को  सही  दिशा  दे  सकेंगे  l  

Sunday, 11 June 2017

अशान्ति इसलिए है कि लोग ईश्वर का नाम तो लेते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते

 संसार  में  विभिन्न  धर्म  हैं ,  ईश्वर  के  अनेक  रूप  हैं  l  लोग  अपने - अपने  तरीके  से  ईश्वर  का  नाम  लेते  हैं   लेकिन  उनके  बताये  मार्ग  पर   नहीं  चलते  l   धर्म  ग्रंथों  में   बताये  गए  श्रेष्ठ  मार्ग   को ,    सद्गुणों   को  नहीं  अपनाते   इसलिए  स्वयं  अशांत  रहकर   दूसरों  को  भी  अशांत  करते  हैं  l  यदि  मनुष्य  अपने  अहंकार  को  छोड़  दे  तो    ईश्वर  के  नाम  में  इतनी  शक्ति   है  जो  युद्ध  की  आग  को  भी  शांत  कर  देती  है   l   एक   प्राचीन  कथा  है  जो  बड़े - बुजुर्ग  सुनाया  करते  थे ----
         एक  राजा   बड़ा  अहंकारी  था  ,  उसमे  अनेक  सद्गुण  थे   लेकिन  वे  सब  अहंकार  से  ढक  गए  थे  l   एक  बार  किसी  अन्य  राजा  से  उसका  विवाद  हो  गया   और  युद्ध  की  स्थिति  उत्पन्न  हो  गई   l  वह  राजा   भगवान्   श्री  राम  का  अनन्य  भक्त  था  ,,  उसे  उनकी  प्रत्यक्ष  कृपा  प्राप्त  थी  l    युद्ध  शुरू  होने  पर  उस  अहंकारी   राजा  का  किसी  ने  साथ  न  दिया   क्योंकि  सब  जानते  थे  कि  वह  दूसरा  राजा  परम  भक्त  और  प्रजापालक  है   l
  जब  अहंकारी  राजा  ने  अपनी  मृत्यु  को  निकट  देखा  तो  घबराया  l  उसके  एक  वृद्ध  मंत्री  ने  सलाह  दी  कि  तुम  श्री  हनुमानजी  की  शरण  में  जाओ  ,  केवल  वे  ही  तुम्हे  बचा  सकते  हैं  और  कोई  नहीं  l   वह  राजा   अपना  धन - वैभव ,  घोड़े - रथ  सब  छोड़ कर  पैदल  ही  भागता - दौड़ता   हनुमानजी   के  चरणों  में  गिर  पड़ा  ,  बोला   --- उस  भक्त  राजा  के  पास  भगवन  श्री  राम  की  दी  हुई  अमोघ  शक्ति  है  उससे  मेरी  रक्षा  करो   l  हनुमानजी  ने  उसे  शरण  दी  और  कहा - अहंकार  छोड़ो,  जैसा  मैं  कहूँ  वैसा  करो  l  उन्हें  तुम  अस्त्र -शस्त्र  से  नहीं  जीत  सकते  l
  युद्ध  के  मैदान  में  दोनों  सेनाएं  थीं  --- एक  ओर  सद्गुण  संपन्न , प्रजापालक  राजा  जिसे  भगवान्  राम  का  संरक्षण  था   और  दूसरी  और   वह  राजा - जो  अहंकार  छोड़ने  का  संकल्प  ले  चुका  था  हनुमानजी  की  शरण  में  था  l  बड़ा  अदभुत  द्रश्य  था  l    श्री  हनुमानजी  ने  उसे  तीन  मन्त्र  बताये   उनके  जपने  से  बड़ी  से  बड़ी  शक्ति  से  भी   कोई  अहित  नहीं  होगा   ---- ' सीता -राम ,  सीता - राम '
         '  श्री राम   जय राम ,   जय - जय  राम  '  श्री राम  जय राम , जय - जय राम '
इन  दोनों  मन्त्रों  के  जपने  से   किसी  शक्ति बाण   ने  उसका  अहित  नहीं  किया ,  नमन  कर  वापस  लौट   गईं l   तो  प्रतिपक्षी  राजा  को  बड़ी  हैरानी  हुई   l  अब  उसने  सबसे  शक्ति शाली  बाण  चलाया  ,  प्रलय  की  सी  स्थिति  उत्पन्न  हो  गई  l  तब  हनुमानजी  ने  उससे  कहा -- सन्मार्ग  पर  चलने  का ,  अपनी  शक्ति  का  लोक - हित  में  उपयोग  करने  का  संकल्प  लो  ,  फिर  सच्चे  मन  से  ईश्वर  का  ध्यान  कर   जप करो                 ' रघुपति  राघव  राजा  राम , पतित  पावन  सीता राम  '  
वह  शक्ति  भी  शांत  हो  गई  और  युद्ध  समाप्त  हो  गया  l    कथा  का  सार  यही  है   कि  हम  ईश्वर  का  नाम  लेने   के  साथ   सन्मार्ग  पर  चलें ,  अपनी  बुराइयों  को  छोड़ें ,  तभी  शांति  संभव  है  

Thursday, 8 June 2017

अशान्ति का कारण मनुष्य का बढ़ता हुआ अहंकार है

  आज  अशान्ति  की  सबसे  बड़ी  वजह  है  कि---- न  केवल  मनुष्य  का  अहंकार  बढ़ता  जा  रहा  है   वरन  ऐसे  अहंकारियों  की  संख्या  भी  दिन - प्रतिदिन  बढ्ती  जा  रही  है  l  परिवार  हो ,  कार्यालय  हो  या  कोई  संस्था  हो  ,  कुछ  लोग    ' विशेष  ' लोगों  की  चापलूसी  कर  स्वयं  को  शक्तिशाली  समझने  लगते  हैं   और  अपनी  हुकूमत  चलाना  चाहते  हैं   l  शक्ति  का  दुरूपयोग  ही  अशांति  का  कारण  है  l   आज  सबसे  बड़ी  जरुरत  सद्बुद्धि  की  है  l   लोग  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  कर  के  अपने  लिए   कमजोर  की  ' हाय '  इकट्ठी  करते  हैं ,  अपनी  ही  नींव  को  खोखला  करते  हैं   l  यदि  सद्बुद्धि  आ  जाये   तो  अपनी  शक्ति  का  उपयोग   समाज  के  कल्याण   के  लिए ,  गिरे  हुए  और  कमजोर  को  ऊपर  उठाने के  लिए  करें    तो   लोगों  से  सच्चा  सम्मान  और  दुआएं  प्राप्त  कर  सकते  है   l  

Sunday, 4 June 2017

परिवार और समाज में अशान्ति का कारण ------ धन का लालच है

 आज  धन  का  लालच  लोगों  पर  इस  कदर  हावी  है  कि  रिश्तों  का  कोई  महत्व  नहीं  रहा  l  आज  से   बहुत   समय  पहले  तक   वर  पक्ष  के  लोग  विवाह  के  समय  जितना  दहेज  मिल  गया ,  उससे  संतुष्ट  हो  जाते  थे   और  रिश्तों  को  निभाते  थे   l   तृष्णा,  लालच  एक  बीमारी  है   इसका  सम्बन्ध  किसी  जाति  या  धर्म  से  नहीं   ,  यह  तो  मन  की  कमजोरी  है  l  लोभ ,  कामना ,  वासना  से  पीड़ित  व्यक्ति  एक  बार  के  दहेज  से  संतुष्ट  नहीं  होता  l  वह  बार - बार  दहेज  चाहता  है   l  ऐसी  स्थिति  में   कोई  धन  कमाने  के  लिए  वैध - अवैध  तरीके  अपनाता  है    तो   कोई  दुबारा  दहेज  पाने  के  के  लिए   निर्दयी  हो  जाता  है  l  यदि  समाज  में  ऐसी  जागरूकता  आ  जाये   कि  यदि  किसी  विवाहिता  ने  आत्महत्या  की  है  या   किसी  की  हत्या  की  गई  है   तो  उस  व्यक्ति   का  दुबारा  विवाह  होना   असंभव  हो  जाये ,  उसे  समाज  स्वीकार  न  करे  |     पुरुष  और  नारी  से  मिलकर  ही  यह  समाज  बना  है   l   यदि  नारी  जागरूक  हो  जाये ,  उसका  आत्मिक  बल  जाग्रत  हो  जाये    तो  नारी  पर  होने  वाले  अत्याचार  समाप्त  हो  जाएँ  l 

Friday, 5 May 2017

मन की शान्ति के लिए प्रार्थना जरुरी है

आज  की  आपा - धापी  की  जिन्दगी  में  प्रत्येक  व्यक्ति  परेशान    है  l    जीवन  में  अनेक  समस्याएं  हैं  इस  कारण  लोग  तनाव  में  जी  रहे  हैं  |   व्यक्ति  अपने  लालच , स्वार्थ  और  अहंकार वश  दूसरों  को  परेशान  करता  है  ,  लेकिन  सबसे  बड़ी  परेशानी  मनुष्य  का  अपना  स्वयं  का  मन  है  l  अपने  ही  क्रोध , कामना ,  वासना  से  व्यक्ति  परेशान  रहता  है   और  इसी  की  वजह  से  अनेक  सांसारिक  समस्याएं  उत्पन्न  होती  हैं  l  इन  सब  से  मुक्ति  के  लिए  जरुरी  है   कि  हम  कुछ  समय  सब  बातों  को  भूलकर  ईश्वर  से  प्रार्थना  करें  l
   हम  नहीं  जानते  कि  हमारे  लिए  क्या  अच्छा  है  क्या  बुरा ,  इसलिए  हमेशा  सद्बुद्धि  के  लिए   ईश्वर  से  प्रार्थना  करें  l   केवल  एक  सद्बुद्धि  होने  से  जीवन  की  सारी  समस्याएं  आसानी  से  हल  हो  जाती  हैं   l
    शरीर   में  कोई  बीमारी  है   तो  उसका  इलाज  अवश्य  कराएँ ,  लेकिन  प्रार्थना  में  इस  सत्य  को  अवश्य  स्वीकारें  कि   अपने  ही  इस  जन्म  या  पिछले  किसी  जन्म  के  पापों  के  फलस्वरूप  यह  बीमारी  है    और  फिर  सच्चे  मन  से  अपनी  जाने - अनजाने  भूलों  के    लिए  पश्चाताप    और  भविष्य   में  सन्मार्ग  पर  चलने  की  शक्ति  देने  के  लिए  प्रार्थना  करें  l   हमें  यह  याद  रखना  चाहिए  कि  निष्काम  कर्म  भी  हम  ईश्वर  की  कृपा  से  ही  कर  पाते  हैं   l      जब  हम  अपने  जीवन  में  निष्काम  कर्म  करते  हैं  और  सच्चे  दिल  से  प्रार्थना  करते  हैं  ,  तो  वे  प्रार्थनाएं  अवश्य  सुनी  जाती  हैं  l  हमें  सन्मार्ग  पर  चलते  हुए  धैर्य  और  विश्वास  रखना   चाहिए   और  उस  आत्मिक  आनन्द  का  इन्तजार  करना  चाहिए  कि  उस  अज्ञात  शक्ति   की  नजरों  से  हम  दूर  नहीं  ,  उसने    हमारी  प्रार्थना  सुन  ली   l 

Monday, 1 May 2017

सुख - शांति से जीना है तो अपना मुखौटा उतारना होगा

  सच्चाई  और  ईमानदारी  में  गजब  का  आकर्षण  होता  है  ,  इसलिए  समाज  में  अनेक  लोग  जो   अनैतिक  और  अपराधिक  गतिविधियों  में  संलग्न  होते  हैं   अपने  ऊपर   शराफत  का  मुखौटा  लगाकर  रहते  हैं  l   वे  समाज  में  अपनी  पहचान  ऐसे  रूप  में  दिखाना  चाहते  हैं  कि  उनके  बराबर  कोई  सच्चा , ईमानदार  और  सह्रदय  कोई  है  ही  नहीं  |   ऐसे  लोग  स्वयं  परेशान  रहते  हैं  ,  उनका  सारा  जीवन  इसी  उधेड़बुन  में  चला  जाता  है  कि  इस  झूठी  पहचान  को  कैसे  बनाये  रखा  जाये  ,  इस  कारण  वे  तनावग्रस्त  रहते  हैं  l   ऐसे  लोगों  की  असलियत  जानने  वाले  भी  बहुत  होते  हैं    जो  अपना  मुंह  बंद  रखने  के  लिए   ऐसे  लोगों  से  बहुत  धन  कमा  लेते  हैं  l
  शान्ति  से  जीने  के  लिए  जरुरी  है  कि  हम  सद्गुणों  को  अपनाएं ,  सच्चाई  की  राह  पर  चलें   ताकि  हमें  ऐसे  किसी  मुखौटे  की  जरुरत  ही  न  पड़े  l 

Saturday, 29 April 2017

अनैतिक तरीके से धन कमाना ---- अशान्ति का सबसे बड़ा कारण है

जब  व्यक्ति  बेईमानी  से   और  अवैध  धन्धों  से  जो  समाज  के  लिए  घातक  हैं ---- धन  कमाता  है   तो  इसका  प्रभाव  समाज  पर  कैंसर  की  तरह  होता  है   क्योंकि  यह  काम  कोई  अकेला  नहीं  करता   इसकी  पूरी  श्रंखला  होती  है  जो  धीरे - धीरे  सम्पूर्ण  समाज  को  अपने  गिरफ्त  में  लेती  है   |  जिस  तरह  कैंसर  पूरे   शरीर   में  फैलता  जाता  है   उसी  तरह   यह  भ्रष्टाचार ,  अनैतिक  धन्धे  पूरे  समाज  को  खोखला  कर  देते  हैं   l        इस  समस्या  से  निपटने  के  लिए    यदि  दो - चार  लोगों  को  सजा  भी  दे  दी  जाये  तो  यह  समस्या  हल  नहीं  होगी   |    क्योंकि  इन  अवैध  धन्धे  और  बेईमानी  के  कार्य  से  भी  हजारों  लोगों  को  रोजगार  मिला  हुआ  है  ,  ऐसे  ही  लोगों  की  दम  पर  उनका  व  उनके  परिवार  का  पेट  पलता  है  ,  इसलिए   इस  श्रंखला  को    तोड़ना   बहुत  कठिन  है   l
लेकिन  समाज  में  शान्ति   के  लिए  ईमानदारी , सच्चाई   और  नैतिकता  जरुरी  है    l   किसी  भी  समस्या  से  निपटने  के  लिए  विवेक  की  जरुरत  होती  है  l  सर्वप्रथम  नि:स्वार्थ  सेवा  और  परोपकार  कर  आत्म - बल   बढ़ाना  जरुरी  है   l   जब  ऐसे  आत्मशक्ति  संपन्न   और  सच्चाई  व  ईमानदारी  की  राह  पर  चलने  वाले  लोग  ज्यादा  होंगे   तो  बेईमानी  व  अनैतिकता  को  पनपने  का  मौका  ही  नहीं  मिलेगा  ,  ऐसे  लोग  या  तो  नष्ट  होंगे   या  स्वयं  को  बदलकर  सच्चाई  की  राह  पर  चलेंगे   |