हमें अपने जीवन में विभिन्न स्वभाव के लोगों का सामना करना पड़ता है । तनावरहित जीवन जीने के लिए यह बहुत जरुरी है कि हम लोगों के कटु व्यवहार से परेशान न हों । हमेशा इस बात का स्मरण रखें कि प्रत्येक व्यक्ति दुर्व्यवहार करके अपना परिचय ही देता है कि उसका मानसिक स्तर कैसा है । इसलिए ऐसे लोगों के व्यवहार से हम अपना मन बोझिल न होने दें । उनके साथ वाद - विवाद कर अपनी उर्जा नष्ट न करें ।
Friday, 27 November 2015
Wednesday, 25 November 2015
जीवन में सफलता और मन में शान्ति चाहिए तो कीमत चुकानी होगी
संसार के बाजार में कुछ चाहिए तो मुद्रा में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन ईश्वर से प्रकृति से कुछ चाहिए तो धार्मिक स्थलों पर रूपये -पैसे चढ़ाने से , फूलमाला , फल -मिठाई आदि का भोग लगाने से कुछ नहीं मिलता , ये सब कर्मकांड तभी सार्थक हैं जब इनके साथ सत्कर्म किये
जाएँ । अध्यात्म में सफलता हो या संसार में सफलता दोनों के लिए ही सत्कर्म अनिवार्य हैं ।
और ये सत्कर्म निष्काम भाव से किये जाएँ , इनमे कोई दिखावा न हो ।
निष्काम कर्म करने से ही ईश्वर की कृपा मिलती है , हमारे मन के विकार दूर होते हैं ---- इससे दोहरा लाभ है --- एक तो मन निर्मल हो जाने से ध्यान करना आसान हो जाता है और दूसरी ओर संसार में सफलता मिलती है । सत्कर्म ढाल बनकर हमारी रक्षा करते हैं ।
जाएँ । अध्यात्म में सफलता हो या संसार में सफलता दोनों के लिए ही सत्कर्म अनिवार्य हैं ।
और ये सत्कर्म निष्काम भाव से किये जाएँ , इनमे कोई दिखावा न हो ।
निष्काम कर्म करने से ही ईश्वर की कृपा मिलती है , हमारे मन के विकार दूर होते हैं ---- इससे दोहरा लाभ है --- एक तो मन निर्मल हो जाने से ध्यान करना आसान हो जाता है और दूसरी ओर संसार में सफलता मिलती है । सत्कर्म ढाल बनकर हमारी रक्षा करते हैं ।
Saturday, 21 November 2015
आत्मविश्वास जगाएं
संसार में सफल होने के लिए आत्मविश्वास बहुत जरुरी है । हम आत्मविश्वासी कैसे बने ?
' ईश्वर विश्वास ही आत्मविश्वास की कुंजी है । '
विषमताओं से भरे इस संसार में , जहाँ भावनाएं और संवेदनाएं लगभग समाप्त हो चुकी है , किसी का भी विश्वास नहीं किया जा सकता , वहां ईश्वर विश्वास सबसे बड़ा संबल है । हमारा विश्वास सफल हो --- इसके लिए जरुरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने का निरंतर प्रयास करें और सद्गुणों को अपने जीवन में अपनाएं । निष्काम कर्म अवश्य करें । सत्कर्म करने से ही हम ईश्वर की कृपा के पात्र बनते हैं और यह भाव कि ' हमारी मदद करने वाले ईश्वर हैं , परमपिता परमेश्वर हैं ' हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है ।
' ईश्वर विश्वास ही आत्मविश्वास की कुंजी है । '
विषमताओं से भरे इस संसार में , जहाँ भावनाएं और संवेदनाएं लगभग समाप्त हो चुकी है , किसी का भी विश्वास नहीं किया जा सकता , वहां ईश्वर विश्वास सबसे बड़ा संबल है । हमारा विश्वास सफल हो --- इसके लिए जरुरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने का निरंतर प्रयास करें और सद्गुणों को अपने जीवन में अपनाएं । निष्काम कर्म अवश्य करें । सत्कर्म करने से ही हम ईश्वर की कृपा के पात्र बनते हैं और यह भाव कि ' हमारी मदद करने वाले ईश्वर हैं , परमपिता परमेश्वर हैं ' हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है ।
Friday, 20 November 2015
जीवन जीने की कला की जरुरत क्यों है ?
संसार में अच्छे लोग हैं , जो सत्कर्म करते हैं , सन्मार्ग पर चलते हैं लेकिन इसके साथ ही अनीति पर चलने वाले , अन्यायी , अत्याचारी भी बहुत हैं जिनका प्रतिदिन हमें सामना करना पड़ता है ,
दुष्टता , असुरता आज से नहीं है , युगों से इस धरती पर दुष्प्रवृत्तियों के लोग रहते आ रहें हैं ।
चाहे भगवान् राम का युग हो , ईसा मसीह हों , गुरु नानक हों या कबीर हों , सबके समय में दुष्ट लोग थे जिन्होंने सच्चाई पर चलने वालों पर अत्याचार किये ।
व्यक्ति अपना दुष्टता का स्वभाव नहीं बदलता ----- शराबी चाहे छत से गिर जाये , उसकी सब हड्डियाँ टूट जाएँ लेकिन वो शराब पीना नहीं छोड़ता , भिखारी को कहें कि भगवन नाम की माला जपो , कुछ श्रम करो , उसके लिए रूपये देंगे , तो वह यह काम नहीं करेगा , उसे तो भीख माँगना ही अच्छा लगेगा । इसी तरह कुछ लोगों का भयंकर बीमारी से शरीर का कोई अंग काटना पड़ता है , वे ठीक भी हो जाते हैं लेकिन इतनी बड़ी ठोकर खाने के बाद भी वे बदलते नहीं । थोड़ा ठीक होते ही उनकी दुष्टता , ईर्ष्या, द्वेष फिर प्रबल हो जाता है । हजारों - लाखों में कोई एक होता है जो ठोकर खाकर , प्रकृति का दंड भोगकर सुधर जाये , नेक रास्ते पर चलने लगे ।
व्यक्ति अपने संस्कार , अपने स्वभाव के प्रति हठी होता है । विचारों में परिवर्तन होने पर ही व्यक्ति में परिवर्तन , रूपांतरण संभव है ।
असुर प्रवृतियों और काम , क्रोध , लोभ , ईर्ष्या - द्वेष जैसी दुष्प्रवृतियों से ग्रस्त लोगों के बीच हमें हर पल रहना पड़ता है , इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश देकर हमें जीना सिखाया , इस संसार में जहाँ चारों ओर छल -कपट है , तरह -तरह के आकर्षण है , कैसे हम शांतिपूर्वक रहें , संसार के सारे काम भी करें और परेशान भी न हों । जीवन अनमोल है , इसे रो - पीट कर , शिकायते कर नहीं गंवाएं । गीता का ज्ञान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है ।
दुष्टता , असुरता आज से नहीं है , युगों से इस धरती पर दुष्प्रवृत्तियों के लोग रहते आ रहें हैं ।
चाहे भगवान् राम का युग हो , ईसा मसीह हों , गुरु नानक हों या कबीर हों , सबके समय में दुष्ट लोग थे जिन्होंने सच्चाई पर चलने वालों पर अत्याचार किये ।
व्यक्ति अपना दुष्टता का स्वभाव नहीं बदलता ----- शराबी चाहे छत से गिर जाये , उसकी सब हड्डियाँ टूट जाएँ लेकिन वो शराब पीना नहीं छोड़ता , भिखारी को कहें कि भगवन नाम की माला जपो , कुछ श्रम करो , उसके लिए रूपये देंगे , तो वह यह काम नहीं करेगा , उसे तो भीख माँगना ही अच्छा लगेगा । इसी तरह कुछ लोगों का भयंकर बीमारी से शरीर का कोई अंग काटना पड़ता है , वे ठीक भी हो जाते हैं लेकिन इतनी बड़ी ठोकर खाने के बाद भी वे बदलते नहीं । थोड़ा ठीक होते ही उनकी दुष्टता , ईर्ष्या, द्वेष फिर प्रबल हो जाता है । हजारों - लाखों में कोई एक होता है जो ठोकर खाकर , प्रकृति का दंड भोगकर सुधर जाये , नेक रास्ते पर चलने लगे ।
व्यक्ति अपने संस्कार , अपने स्वभाव के प्रति हठी होता है । विचारों में परिवर्तन होने पर ही व्यक्ति में परिवर्तन , रूपांतरण संभव है ।
असुर प्रवृतियों और काम , क्रोध , लोभ , ईर्ष्या - द्वेष जैसी दुष्प्रवृतियों से ग्रस्त लोगों के बीच हमें हर पल रहना पड़ता है , इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश देकर हमें जीना सिखाया , इस संसार में जहाँ चारों ओर छल -कपट है , तरह -तरह के आकर्षण है , कैसे हम शांतिपूर्वक रहें , संसार के सारे काम भी करें और परेशान भी न हों । जीवन अनमोल है , इसे रो - पीट कर , शिकायते कर नहीं गंवाएं । गीता का ज्ञान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है ।
Tuesday, 17 November 2015
सही अर्थों में ईश्वर विश्वासी बने
धर्म चाहे कोई भी हो यदि व्यक्ति केवल कर्मकांड करता है तो यह ईश्वर विश्वास नहीं है । कर्मकांड स्वयं करना या अपने धर्म के पंडित - पुजारी -------- आदि से कराना सरल पड़ता है इसलिए लोग अब इन्ही कर्मकाण्डों में उलझ गये हैं । देखने में लगता है कि धार्मिकता बहुत बढ़ गई है किन्तु वास्तव में सद्गुणों को महत्व न देने के कारण अशांति और अपराध बढ़ गये हैं ।
ईश्वर --- वह अज्ञात शक्ति उसे चाहे किसी भी नाम से पुकारो --- वह सर्वशक्तिमान है । विभिन्न कर्मकांड ने अब व्यवसाय का रूप ले लिया है इसलिए अब उसका सुफल नहीं मिलता है ।
ईश्वर विश्वास का , ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल तरीका है ----- सत्कर्म करना । हम चाहे किसी भी धर्म के हों , यदि नि:स्वार्थ भाव से सत्कर्म करते हैं , सेवा - परोपकार के कार्य करते हैं तो यही सच्ची पूजा है । यही श्रेष्ठ कर्म ढाल बनकर हमारी रक्षा करते हैं ।
कोई व्यक्ति आस्तिक , ईश्वर विश्वासी तभी कहलायेगा जब वह सत्कर्म करेगा , अपनी बुरी आदतों को छोड़कर सद्गुणों को अपनाएगा , सन्मार्ग पर चलेगा ।
ईश्वर --- वह अज्ञात शक्ति उसे चाहे किसी भी नाम से पुकारो --- वह सर्वशक्तिमान है । विभिन्न कर्मकांड ने अब व्यवसाय का रूप ले लिया है इसलिए अब उसका सुफल नहीं मिलता है ।
ईश्वर विश्वास का , ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल तरीका है ----- सत्कर्म करना । हम चाहे किसी भी धर्म के हों , यदि नि:स्वार्थ भाव से सत्कर्म करते हैं , सेवा - परोपकार के कार्य करते हैं तो यही सच्ची पूजा है । यही श्रेष्ठ कर्म ढाल बनकर हमारी रक्षा करते हैं ।
कोई व्यक्ति आस्तिक , ईश्वर विश्वासी तभी कहलायेगा जब वह सत्कर्म करेगा , अपनी बुरी आदतों को छोड़कर सद्गुणों को अपनाएगा , सन्मार्ग पर चलेगा ।
Monday, 16 November 2015
जब लोगों के मन में शान्ति होगी तभी संसार में शान्ति होगी
आज लोगों के मन अशांत हैं , यही अशांति समाज में विभिन्न रूपों में दिखायी देती है | आतंक व अन्याय को दूर करने के लिए विभिन्न सरकारें प्रयास करती हैं ।
यदि हम संसार में स्थायी शान्ति चाहते हैं तो प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को बदलना होगा जो अहंकारी है , लालची है , क्रोधी है , कामांध है । क्योंकि इन दुष्प्रवृत्तियों के आधीन होकर ही व्यक्ति दूसरों को सताता है , उनका हक छीनता है , शोषण करता है । स्वयं को श्रेष्ठ समझ कर दूसरों की हँसी उड़ाना, उनकी उपेक्षा करना ---- ये सब ऐसी प्रवृतियां हैं जो पीड़ित के मन में बदले की भावना भर देती हैं । इसी से समाज में अशांति और अपराध होते हैं ।
हमें संकल्प लेकर स्वयं को बदलना होगा , अपनी दुष्प्रवृत्तियों को त्याग कर , सदगुणों को अपनाना होगा । जब गुणी व्यक्ति अधिकाधिक होंगे तभी शान्ति होगी ।
यदि हम संसार में स्थायी शान्ति चाहते हैं तो प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को बदलना होगा जो अहंकारी है , लालची है , क्रोधी है , कामांध है । क्योंकि इन दुष्प्रवृत्तियों के आधीन होकर ही व्यक्ति दूसरों को सताता है , उनका हक छीनता है , शोषण करता है । स्वयं को श्रेष्ठ समझ कर दूसरों की हँसी उड़ाना, उनकी उपेक्षा करना ---- ये सब ऐसी प्रवृतियां हैं जो पीड़ित के मन में बदले की भावना भर देती हैं । इसी से समाज में अशांति और अपराध होते हैं ।
हमें संकल्प लेकर स्वयं को बदलना होगा , अपनी दुष्प्रवृत्तियों को त्याग कर , सदगुणों को अपनाना होगा । जब गुणी व्यक्ति अधिकाधिक होंगे तभी शान्ति होगी ।
Saturday, 14 November 2015
जीवन जीना सीखें
जो गरीब हैं , बेरोजगार हैं उनकी समस्या तो समझ में आती है लेकिन जो संपन्न हैं , उच्च पदों पर हैं , जिनकी पर्याप्त आय है ----- ऐसे लोग परेशान हैं तो इसका अर्थ है कि उन्हें जीवन जीना नहीं आता | व्यक्ति की अधिकांश समस्याएं उसकी स्वयं की आदतों की वजह से हैं । जैसे --- आज की युवा पीढ़ी के लोग जब पढ़ - लिख कर उच्च पदों पर पहुंचकर पर्याप्त कमाने लगते हैं तो वे अपने फालतू समय का उपयोग शराब , सिगरेट , आदि गलत आदतों में करते हैं । इससे उन्हें स्वयं नुकसान होता है । नशे की आदत होने से सेहत ख़राब होती है और वे अपनी आय का सकारात्मक उपयोग नहीं कर पाते । बचपन से ही यदि बच्चों को सिखाया जाये कि उनका जीवन अनमोल है , जो कुछ करना है , उन्हें इसी शरीर से करना है , उन्हें शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में स्वस्थ रहना है तभी जीवन में सफल होंगे । जब व्यक्ति स्वयं से प्यार करना सीख जायेगा तो वह कोई ऐसा काम नहीं करेगा जिससे स्वयं का नुकसान हो । धन के लाभ - हानि के प्रति व्यक्ति जितना जागरूक रहता है , उतना ही यदि अपनी शारीरिक और मानसिक उर्जा के प्रति जागरूक रहे तो जीवन की अधिकांश समस्याएं सुलझ जाये ।
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