संवेदना न होने से परिवार टूट रहे हैं , अत्याचार और अन्याय बढ़ा है l पहले छोटी - छोटी रियासते थीं , तो यह स्पष्ट था कि वहीँ के शक्तिशाली कमजोर पर अत्याचार कर रहे हैं l अब वैश्विकरण का युग है , बाजार की तरह अत्याचार , अन्याय , भ्रष्टाचार और अपराध ---- यह सब भी वैश्विक स्तर पर है l आज इंटरनेट के युग में यह समझना बहुत कठिन है कि सामने जो अपराध या अत्याचार कर रहा है उसकी डोर किस के हाथ में है , अपनी कमजोरियों के कारण वह किसके इशारों पर काम कर रहा है l आज की सबसे बड़ी जरुरत है --हम अपना आत्मिक बल बढ़ाएं l नि:स्वार्थ भाव से , ईमानदारी से कर्तव्य पालन करना ही एक तपस्या है l ऐसा कर के शान्ति से रहा जा सकता है है
Wednesday, 14 June 2017
संसार में सुख - शांति के लिए जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना अनिवार्य है
नारी और पुरुष एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं , एक पहिया अच्छा हो और दूसरा पंक्चर हो तो गाड़ी नहीं चलेगी l इसी तरह नारी और पुरुष में से एक वर्ग सन्मार्ग पर चले और दूसरा स्वेच्छाचारी हो तो समाज का सही ढंग से विकास नहीं हो सकता l सबसे बड़ी जरुरत यही है कि नारी और पुरुष दोनों ही सद्गुणों को अपने जीवन में अपनाएं तभी वे आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दे सकेंगे l
Sunday, 11 June 2017
अशान्ति इसलिए है कि लोग ईश्वर का नाम तो लेते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते
संसार में विभिन्न धर्म हैं , ईश्वर के अनेक रूप हैं l लोग अपने - अपने तरीके से ईश्वर का नाम लेते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते l धर्म ग्रंथों में बताये गए श्रेष्ठ मार्ग को , सद्गुणों को नहीं अपनाते इसलिए स्वयं अशांत रहकर दूसरों को भी अशांत करते हैं l यदि मनुष्य अपने अहंकार को छोड़ दे तो ईश्वर के नाम में इतनी शक्ति है जो युद्ध की आग को भी शांत कर देती है l एक प्राचीन कथा है जो बड़े - बुजुर्ग सुनाया करते थे ----
एक राजा बड़ा अहंकारी था , उसमे अनेक सद्गुण थे लेकिन वे सब अहंकार से ढक गए थे l एक बार किसी अन्य राजा से उसका विवाद हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई l वह राजा भगवान् श्री राम का अनन्य भक्त था ,, उसे उनकी प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त थी l युद्ध शुरू होने पर उस अहंकारी राजा का किसी ने साथ न दिया क्योंकि सब जानते थे कि वह दूसरा राजा परम भक्त और प्रजापालक है l
जब अहंकारी राजा ने अपनी मृत्यु को निकट देखा तो घबराया l उसके एक वृद्ध मंत्री ने सलाह दी कि तुम श्री हनुमानजी की शरण में जाओ , केवल वे ही तुम्हे बचा सकते हैं और कोई नहीं l वह राजा अपना धन - वैभव , घोड़े - रथ सब छोड़ कर पैदल ही भागता - दौड़ता हनुमानजी के चरणों में गिर पड़ा , बोला --- उस भक्त राजा के पास भगवन श्री राम की दी हुई अमोघ शक्ति है उससे मेरी रक्षा करो l हनुमानजी ने उसे शरण दी और कहा - अहंकार छोड़ो, जैसा मैं कहूँ वैसा करो l उन्हें तुम अस्त्र -शस्त्र से नहीं जीत सकते l
युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं थीं --- एक ओर सद्गुण संपन्न , प्रजापालक राजा जिसे भगवान् राम का संरक्षण था और दूसरी और वह राजा - जो अहंकार छोड़ने का संकल्प ले चुका था हनुमानजी की शरण में था l बड़ा अदभुत द्रश्य था l श्री हनुमानजी ने उसे तीन मन्त्र बताये उनके जपने से बड़ी से बड़ी शक्ति से भी कोई अहित नहीं होगा ---- ' सीता -राम , सीता - राम '
' श्री राम जय राम , जय - जय राम ' श्री राम जय राम , जय - जय राम '
इन दोनों मन्त्रों के जपने से किसी शक्ति बाण ने उसका अहित नहीं किया , नमन कर वापस लौट गईं l तो प्रतिपक्षी राजा को बड़ी हैरानी हुई l अब उसने सबसे शक्ति शाली बाण चलाया , प्रलय की सी स्थिति उत्पन्न हो गई l तब हनुमानजी ने उससे कहा -- सन्मार्ग पर चलने का , अपनी शक्ति का लोक - हित में उपयोग करने का संकल्प लो , फिर सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान कर जप करो ' रघुपति राघव राजा राम , पतित पावन सीता राम '
वह शक्ति भी शांत हो गई और युद्ध समाप्त हो गया l कथा का सार यही है कि हम ईश्वर का नाम लेने के साथ सन्मार्ग पर चलें , अपनी बुराइयों को छोड़ें , तभी शांति संभव है
एक राजा बड़ा अहंकारी था , उसमे अनेक सद्गुण थे लेकिन वे सब अहंकार से ढक गए थे l एक बार किसी अन्य राजा से उसका विवाद हो गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई l वह राजा भगवान् श्री राम का अनन्य भक्त था ,, उसे उनकी प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त थी l युद्ध शुरू होने पर उस अहंकारी राजा का किसी ने साथ न दिया क्योंकि सब जानते थे कि वह दूसरा राजा परम भक्त और प्रजापालक है l
जब अहंकारी राजा ने अपनी मृत्यु को निकट देखा तो घबराया l उसके एक वृद्ध मंत्री ने सलाह दी कि तुम श्री हनुमानजी की शरण में जाओ , केवल वे ही तुम्हे बचा सकते हैं और कोई नहीं l वह राजा अपना धन - वैभव , घोड़े - रथ सब छोड़ कर पैदल ही भागता - दौड़ता हनुमानजी के चरणों में गिर पड़ा , बोला --- उस भक्त राजा के पास भगवन श्री राम की दी हुई अमोघ शक्ति है उससे मेरी रक्षा करो l हनुमानजी ने उसे शरण दी और कहा - अहंकार छोड़ो, जैसा मैं कहूँ वैसा करो l उन्हें तुम अस्त्र -शस्त्र से नहीं जीत सकते l
युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं थीं --- एक ओर सद्गुण संपन्न , प्रजापालक राजा जिसे भगवान् राम का संरक्षण था और दूसरी और वह राजा - जो अहंकार छोड़ने का संकल्प ले चुका था हनुमानजी की शरण में था l बड़ा अदभुत द्रश्य था l श्री हनुमानजी ने उसे तीन मन्त्र बताये उनके जपने से बड़ी से बड़ी शक्ति से भी कोई अहित नहीं होगा ---- ' सीता -राम , सीता - राम '
' श्री राम जय राम , जय - जय राम ' श्री राम जय राम , जय - जय राम '
इन दोनों मन्त्रों के जपने से किसी शक्ति बाण ने उसका अहित नहीं किया , नमन कर वापस लौट गईं l तो प्रतिपक्षी राजा को बड़ी हैरानी हुई l अब उसने सबसे शक्ति शाली बाण चलाया , प्रलय की सी स्थिति उत्पन्न हो गई l तब हनुमानजी ने उससे कहा -- सन्मार्ग पर चलने का , अपनी शक्ति का लोक - हित में उपयोग करने का संकल्प लो , फिर सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान कर जप करो ' रघुपति राघव राजा राम , पतित पावन सीता राम '
वह शक्ति भी शांत हो गई और युद्ध समाप्त हो गया l कथा का सार यही है कि हम ईश्वर का नाम लेने के साथ सन्मार्ग पर चलें , अपनी बुराइयों को छोड़ें , तभी शांति संभव है
Thursday, 8 June 2017
अशान्ति का कारण मनुष्य का बढ़ता हुआ अहंकार है
आज अशान्ति की सबसे बड़ी वजह है कि---- न केवल मनुष्य का अहंकार बढ़ता जा रहा है वरन ऐसे अहंकारियों की संख्या भी दिन - प्रतिदिन बढ्ती जा रही है l परिवार हो , कार्यालय हो या कोई संस्था हो , कुछ लोग ' विशेष ' लोगों की चापलूसी कर स्वयं को शक्तिशाली समझने लगते हैं और अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं l शक्ति का दुरूपयोग ही अशांति का कारण है l आज सबसे बड़ी जरुरत सद्बुद्धि की है l लोग अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर के अपने लिए कमजोर की ' हाय ' इकट्ठी करते हैं , अपनी ही नींव को खोखला करते हैं l यदि सद्बुद्धि आ जाये तो अपनी शक्ति का उपयोग समाज के कल्याण के लिए , गिरे हुए और कमजोर को ऊपर उठाने के लिए करें तो लोगों से सच्चा सम्मान और दुआएं प्राप्त कर सकते है l
Sunday, 4 June 2017
परिवार और समाज में अशान्ति का कारण ------ धन का लालच है
आज धन का लालच लोगों पर इस कदर हावी है कि रिश्तों का कोई महत्व नहीं रहा l आज से बहुत समय पहले तक वर पक्ष के लोग विवाह के समय जितना दहेज मिल गया , उससे संतुष्ट हो जाते थे और रिश्तों को निभाते थे l तृष्णा, लालच एक बीमारी है इसका सम्बन्ध किसी जाति या धर्म से नहीं , यह तो मन की कमजोरी है l लोभ , कामना , वासना से पीड़ित व्यक्ति एक बार के दहेज से संतुष्ट नहीं होता l वह बार - बार दहेज चाहता है l ऐसी स्थिति में कोई धन कमाने के लिए वैध - अवैध तरीके अपनाता है तो कोई दुबारा दहेज पाने के के लिए निर्दयी हो जाता है l यदि समाज में ऐसी जागरूकता आ जाये कि यदि किसी विवाहिता ने आत्महत्या की है या किसी की हत्या की गई है तो उस व्यक्ति का दुबारा विवाह होना असंभव हो जाये , उसे समाज स्वीकार न करे | पुरुष और नारी से मिलकर ही यह समाज बना है l यदि नारी जागरूक हो जाये , उसका आत्मिक बल जाग्रत हो जाये तो नारी पर होने वाले अत्याचार समाप्त हो जाएँ l
Friday, 5 May 2017
मन की शान्ति के लिए प्रार्थना जरुरी है
आज की आपा - धापी की जिन्दगी में प्रत्येक व्यक्ति परेशान है l जीवन में अनेक समस्याएं हैं इस कारण लोग तनाव में जी रहे हैं | व्यक्ति अपने लालच , स्वार्थ और अहंकार वश दूसरों को परेशान करता है , लेकिन सबसे बड़ी परेशानी मनुष्य का अपना स्वयं का मन है l अपने ही क्रोध , कामना , वासना से व्यक्ति परेशान रहता है और इसी की वजह से अनेक सांसारिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं l इन सब से मुक्ति के लिए जरुरी है कि हम कुछ समय सब बातों को भूलकर ईश्वर से प्रार्थना करें l
हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा , इसलिए हमेशा सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें l केवल एक सद्बुद्धि होने से जीवन की सारी समस्याएं आसानी से हल हो जाती हैं l
शरीर में कोई बीमारी है तो उसका इलाज अवश्य कराएँ , लेकिन प्रार्थना में इस सत्य को अवश्य स्वीकारें कि अपने ही इस जन्म या पिछले किसी जन्म के पापों के फलस्वरूप यह बीमारी है और फिर सच्चे मन से अपनी जाने - अनजाने भूलों के लिए पश्चाताप और भविष्य में सन्मार्ग पर चलने की शक्ति देने के लिए प्रार्थना करें l हमें यह याद रखना चाहिए कि निष्काम कर्म भी हम ईश्वर की कृपा से ही कर पाते हैं l जब हम अपने जीवन में निष्काम कर्म करते हैं और सच्चे दिल से प्रार्थना करते हैं , तो वे प्रार्थनाएं अवश्य सुनी जाती हैं l हमें सन्मार्ग पर चलते हुए धैर्य और विश्वास रखना चाहिए और उस आत्मिक आनन्द का इन्तजार करना चाहिए कि उस अज्ञात शक्ति की नजरों से हम दूर नहीं , उसने हमारी प्रार्थना सुन ली l
हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा , इसलिए हमेशा सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें l केवल एक सद्बुद्धि होने से जीवन की सारी समस्याएं आसानी से हल हो जाती हैं l
शरीर में कोई बीमारी है तो उसका इलाज अवश्य कराएँ , लेकिन प्रार्थना में इस सत्य को अवश्य स्वीकारें कि अपने ही इस जन्म या पिछले किसी जन्म के पापों के फलस्वरूप यह बीमारी है और फिर सच्चे मन से अपनी जाने - अनजाने भूलों के लिए पश्चाताप और भविष्य में सन्मार्ग पर चलने की शक्ति देने के लिए प्रार्थना करें l हमें यह याद रखना चाहिए कि निष्काम कर्म भी हम ईश्वर की कृपा से ही कर पाते हैं l जब हम अपने जीवन में निष्काम कर्म करते हैं और सच्चे दिल से प्रार्थना करते हैं , तो वे प्रार्थनाएं अवश्य सुनी जाती हैं l हमें सन्मार्ग पर चलते हुए धैर्य और विश्वास रखना चाहिए और उस आत्मिक आनन्द का इन्तजार करना चाहिए कि उस अज्ञात शक्ति की नजरों से हम दूर नहीं , उसने हमारी प्रार्थना सुन ली l
Monday, 1 May 2017
सुख - शांति से जीना है तो अपना मुखौटा उतारना होगा
सच्चाई और ईमानदारी में गजब का आकर्षण होता है , इसलिए समाज में अनेक लोग जो अनैतिक और अपराधिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं अपने ऊपर शराफत का मुखौटा लगाकर रहते हैं l वे समाज में अपनी पहचान ऐसे रूप में दिखाना चाहते हैं कि उनके बराबर कोई सच्चा , ईमानदार और सह्रदय कोई है ही नहीं | ऐसे लोग स्वयं परेशान रहते हैं , उनका सारा जीवन इसी उधेड़बुन में चला जाता है कि इस झूठी पहचान को कैसे बनाये रखा जाये , इस कारण वे तनावग्रस्त रहते हैं l ऐसे लोगों की असलियत जानने वाले भी बहुत होते हैं जो अपना मुंह बंद रखने के लिए ऐसे लोगों से बहुत धन कमा लेते हैं l
शान्ति से जीने के लिए जरुरी है कि हम सद्गुणों को अपनाएं , सच्चाई की राह पर चलें ताकि हमें ऐसे किसी मुखौटे की जरुरत ही न पड़े l
शान्ति से जीने के लिए जरुरी है कि हम सद्गुणों को अपनाएं , सच्चाई की राह पर चलें ताकि हमें ऐसे किसी मुखौटे की जरुरत ही न पड़े l
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