Monday, 8 October 2018

बुद्धि और शक्ति के दुरूपयोग से समाज में अराजकता बढ़ती है

  नशा ,  शराब , गुटका , तम्बाकू  आदि    के  कारण  व्यक्ति  का  चारित्रिक  पतन  होता  है  ,  लेकिन  अपराध  और  संस्कृति  को  पतन  की  और  ले  जाने  वाली   ह्रदय विदारक  घटनाएँ  तभी  बढ़ती  हैं  बुद्धि  और  शक्ति  से  संपन्न  व्यक्ति   इन  घटनाओं  को   छोटी  और  साधारण  कहकर  नजरंदाज  कर  देते  हैं   l  इससे अपराधियों  के  हौसले  बढ़ते  हैं   l  अपराध  इसलिए  भी  बढ़ते  हैं  क्योंकि   ऐसे  दुर्बुद्धि ग्रस्त  लोग  समाज  में  अपना  रुतबा  और  भय   कायम  करने  के  लिए  अपराधियों  की  मदद  लेते  हैं  l  कभी  विदेशी  आततायियों  से  बेटियों को  बचाने  के  लिए   परदा - प्रथा  शुरू  हुई  थी  ,  अब  देशी  आततायियों  से  बेटी बचाना  कठिन  समस्या  है   l   एक  साधारण ,  अति  सामान्य  व्यक्ति  यदि  कोई  अपराध  करता  है  तो  उसका  प्रभाव  उस  पर और  अधिक - से - अधिक   उसके  परिवार  पर  पड़ता  है  l   लेकिन   जब  बुद्धि  ,  धन  और  शक्ति  से  संपन्न  व्यक्ति  अपराध  करते  हैं ,  अपराधियों  को  संरक्षण  देते  हैं   तो  उसका  दुष्प्रभाव  सम्पूर्ण  समाज  और  राष्ट्र  पर  पड़ता  l  छोटी - छोटी  बच्चियों  की  चीखों  और  आहों  से  प्रकृति  को  भी  कष्ट  होता  है  और  उसका  परिणाम  सामूहिक  दंड  के  रूप  में  सम्पूर्ण  समाज  को  भोगना  पड़ता है  l
  संवेदनहीन   समाज  का  सबसे  दुःखद  पहलू   यह  है  कि  इसमें  कायरता   अति  की  बढ़  जाती  है  ,  लोगों  का  दोहरा  चरित्र  होता  है  ,  असली  अपराधी  को  पहचानना  कठिन  होता  है  l  

Saturday, 6 October 2018

दुर्बुद्धि के कारण मनुष्य की दुर्गति होती है

 इस  सम्बन्ध  में   एक  कथा  है -----  राजा  नहुष   को  पुण्य  कार्यों  के  फलस्वरूप  स्वर्ग  जाने  का  अवसर  मिला   और  इंद्र  पद  के  अधिकारी  हो  गए  l   इतना  उच्च  पद  पाकर  वे  मदांध  हो  गए   और  सोचने  लगे  कि  इंद्र  के  अंत:पुर  पर  भी  उनका  अधिकार  होना  चाहिए   और  इन्द्राणी  समेत  उनकी  सब  सखियों  को   उनकी  सेवा  में  रहना  चाहिए  l  यह   सूचना    इन्द्राणी  तक  पहुंची  तो  वे  बहुत  विचलित  हो   गईं  और  वे  इस  समस्या  से  बचने  का  उपाय  सोचने  लगीं  l 
  इन्द्राणी  ने   कूटनीतिक   चाल  चली  l  उन्होंने  नहुष  को  कहला  भेजा  कि   वे  सप्त ऋषियों  को  पालकी  में  जोतकर  उस  पर  बैठकर   अंत:पुर  आयें  तभी  उनका  स्वागत  होगा   l 
मदांध  को  भला - बुरा  नहीं  सूझता  ,  उन्होंने   तत्काल  यह  प्रस्ताव  स्वीकार  कर  लिया   और  सप्त ऋषियों  को  पालकी  में  जोतकर   अंत:पुर  चले   l   मार्ग  की  दूरी  में  लगने  वाला  विलम्ब  उनसे  सहन  नहीं  हो  रहा  था   l  ऋषि  कमजोर  थे  ,  नहुष  पालकी  में  बैठे  थे  l  इतनी  भारी  पालकी  को  उठाकर  वे  धीरे - धीरे  चल  रहे  थे  l    ऋषियों  को  दौड़ने  का  आदेश  देते  हुए   वे  अपनी  भाषा  में  सर्पि  सर्पि  कहने  लगे   l  ऋषियों  से  यह  अपमान   सहा  नहीं  गया  ,  उन्हें  क्रोध  भी  आ  गया   l  उनने  पालकी  को  धरती  पर  पटक  दिया   और  शाप  दिया   कि  सर्पि  सर्पि  कहने  वाले  को  सर्प  की  योनि  मिले   l  नहुष  पालकी  से  गिरकर  धरती  पर  आ  गए  और  सर्प  की  योनि  में  बुरे  दिन  बिताने  लगे  l  

Friday, 5 October 2018

संसार में अशांति का कारण मनुष्य का नैतिक पतन है

 कहते  हैं  हम  सबके  मन  के  तार  ईश्वर  से  जुड़े  हैं  ,  इसलिए   व्यक्ति   की  भावनाएं  कैसी  हैं  , उसके  अंत:करण  में   कैसे  विचार - भावनाएं  हैं  यह  सब  ईश्वर  जानते  हैं  l  इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है  ---- नारदजी  एक  बार  धरती  पर  भ्रमण  को  आये   l  उन्होंने  देखा  धरती  पर  धार्मिक  उत्सव , कर्मकांड  बहुत  हो  रहे  हैं  ,  सब  लोग  अपने - अपने  तरीके  से  भक्ति  में  मग्न  हैं  ,  लेकिन  अशांति  बहुत  है ,  मनुष्य , पशु - पक्षी ,  पर्यावरण  --- कहीं  कोई  रौनक  नहीं  है ,  अपराध , दुष्कर्म ,  लूटपाट ,  आत्महत्या  आदि  नकारात्मकता  बढ़  गई  है  l    नारदजी  का  मन  नहीं  लगा  और  उन्होंने  भगवान  से  यह  सब  व्यथा  कही   और    मानव  के  कल्याण  का  उपाय पूछा   l   भगवान  ने  कहा -- सच  जानने  के  लिए    तुम  उस  समय  धरती  पर  जाओ  , जब   पृथ्वीवासी  अपने - अपने  भगवान  को  सुला  देते  हैं   l   ईश्वर  के  नाम  का , उनके  स्थान  का  उपयोग   जिस  तरह  करते  हैं   वह  अब  प्रकृति  से  सहन  नहीं  हो  रहा  है   l 
  भगवान  ने  कहा  -- जब  ये  धार्मिक  स्थल  शिक्षा  के  और  लोक कल्याण  के  केंद्र  बनेंगे ,  उनके  माध्यम  से  सद्प्रवृतियों  और  सद्विचारों  का  प्रचार - प्रसार  होगा   तभी  संसार  में  सुख - शांति  होगी  l
  मनुष्यों  पर  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  देखकर  नारदजी  का  मन  व्यथित  हो  गया  l 

Monday, 1 October 2018

अति का अंत होता है

  इस  संसार  में  जब  भी  अत्याचार  अपने  चरम  पर  पहुंचा  है ,  उसका  अंत  हुआ  है   l  संसार  तो  केवल  वही  देख  पाता  है  ,  जो  इन  आँखों  से  दीखता  है  ,  जिनका  सबूत  होता  है  l  जो  अत्याचारी  है  और  अहंकारी  है   वह  अपनी  ओछी  हरकतों  को  इस  तरह  अंजाम  देता  है   जिन्हें  या  तो  सहन  करने  वाला  जानता  है  या  फिर  ईश्वर  जानते  हैं  l  जब  अत्याचार  और  अन्याय  की  अति  हो  जाती है    तब  उसका  अंत  अवश्य  होता  है ,  उसके  लिए  माध्यम  चाहे  कोई  भी  हो  l
   रावण  के  पास  सोने  की  लंका  थी  ,  वेद  व  शास्त्रों  का  ज्ञाता  था  ,  शिव भक्त  था  ,    एक  लाख  पूत  और  सवा लाख  नाती --- भरा - पूरा  परिवार  था  लेकिन  उसे  अपनी  शक्ति  का अहंकार  था  l  ऋषि - मुनियों  ने  उसका  क्या  बिगाड़ा  था   जो  उसने  उनके  यज्ञ, हवन  आदि  पवित्र  कार्यों  को  अपवित्र  किया   उसके   अत्याचारों  की  जब  अति  हो  गई   तब  भगवान  राम  ने  रीछ,  वानरों  की  सेना  लेकर  उसका  अंत  किया  l     इसी  तरह  कंस  ने  अति के  अत्याचार  किये   l  जब  उसे  यह  पता चला  कि  कृष्ण  का  जन्म  हो  चुका   है  ,  तो  उसने  कितने  ही   बालकों  का  वध  करा  दिया  l  मासूम  और  निर्दोष  पर  अत्याचार  प्रकृति  कभी  बर्दाश्त  नहीं  करती  l   कंस ,  दुर्योधन  आदि  सभी  अत्याचारियों का  अंत  हुआ  l 
  जो  गरीब  है ,  निर्धन  है ,  जिसे  दो  वक्त  की  रोटी  की  चिंता  है ,  अपनी  बेटी  की  कुशलता  और  उसके  विवाह  की  चिंता  है  ,  वह  क्या  किसी  पर  अत्याचार  करेगा  l  अत्याचार , अन्याय  और  शोषण  वही  करते  हैं   जो  हर  तरह  से  समर्थ  हैं  ,  दूसरों  को  सताना ,  उनका  शोषण  करना  और  ऐसा  कर  के  आनंदित  होना  उनकी  आदत  होती  है   l  युगों  से  यही  हो  रहा  है  ,  अत्याचारी  का अंत  होता  है ,  फिर  नए  अत्याचारी  पैदा  हो  जाते  हैं   l  यह  उसका  बढ़ - चढ़ा  अहंकार  है   जो  अंत  होते  हुए  भी  अपने  पापों  को  स्वीकार नहीं  करता  ,  आने  वाली  पीढ़ियों  को  सिखाता नहीं  कि  देखो !  इतने  पाप  कर्म  किये  उसका  यह  नतीजा  निकला   l  इसका  परिणाम  यही  होता  है  आने  वाली  पीढ़ियाँ  कम  उम्र  से  ही  अपराध  में  लग  जाती  हैं    l  एक  स्वस्थ  समाज  का  निर्माण  तभी   हो  सकता  है   जब  व्यक्ति   पाप - पुण्य  का  अंतर  समझे ,  अपनी  गलती  को  स्वीकार  कर   स्वयं  को  सुधारने  का प्रयास  करे  l  

Wednesday, 26 September 2018

तनाव रहित जीवन जीने के लिए जरुरी है कि हम ऋषियों और आचार्य द्वारा समझाई गई चेतावनी को समझें

 भगवान  ने  गीता  में  कहा है --- काल  बड़ा  बलवान  होता  है  l ----- इसलिए  वक्त  से  हमेशा  डरकर  रहना  चाहिए ,  वक्त  का मिजाज  कब  बदल  जाये  कोई  नहीं  जानता  l
  सभी धर्मग्रंथों  में  इस  बात  को  कहा  गया  है  कि  कभी  अहंकार न  करे   l  अहंकारी  अपने  अहंकार  को  पोषित  करने  के  लिए   , स्वयं  को  श्रेष्ठ  सिद्ध  करने  के  लिए  दूसरों  का  शोषण  करता  है ,  अत्याचार  और  अन्याय  करता  है  l   शोषण  विनाश  का  प्रतीक  है  ,  इसका  परिणाम  अत्यंत  विनाशकारी  होता  है  l 
   समय   के  छोटे - छोटे  बिन्दुओं  से  मिलकर   यह  जीवन  बना  है   l  इस  अनमोल  जीवन  में   सत्कर्म  की  पूंजी  एकत्र  करें   l   लोगों   पर  अत्याचार  कर  के ,  उन्हें  सता  कर  उनकी  आहें  एकत्र  न  करें  l
  जियो  और  जीने  दो '  का  सिद्धांत  अपनाकर  ही  संसार  में  सुख शांति  स्थापित  हो  सकती  है  l 

Monday, 24 September 2018

समाज में अपराध क्यों बढ़ रहे हैं ?

      अपराध  इसलिए  तेजी  से  बढ़ते  हैं  क्योंकि  यह  समाज  ही  अपराधियों  की  फसल  तैयार  करता  है  l 
   कई  बार  ऐसा  होता  है   कि  कोई  व्यक्ति  जिसने  जघन्य   अपराध   किया  है  , वह   सबूत    न  मिलने  से  बच    जाता  है   l   समाज  उसकी  सच्चाई  जानता  है  फिर  भी  उससे  निकटता  रखते  हैं ,  उसे  सम्मान  देते  हैं  l  इससे  उसकी  अपराध  करने  की  प्रवृति  को  और  बल  मिलता  है  l 
   कभी  परिस्थितियां  ऐसी  उत्पन्न  हो  जाती  हैं   कि  अपराधी  आत्मसमर्पण  कर  देता  है  ,  जैसे  डाकुओं  ने  किया  था   तो   उन्हें   समाज  में  मिलकर  जीने  का  अवसर  मिल  जाता  है   l    संभव  है  कि  समर्पण  के  बाद  वे  कोई  अपराध  न  करें   लेकिन  संस्कार  नहीं  मिटते  l  यह  अपराधी  प्रवृति   उनके  बच्चों  में भाई - बंधू  में  आ  जाती  है   l  जब  अनेक  महान , सज्जन  लोगों  की  संतानें  पथ भ्रष्ट  हो  जाती  हैं  , तो  अपराधी  जिसने  चाहे  अपराध  करना  छोड़  दिया  हो ,  उसकी  संताने कैसे  संत - सज्जन  होंगी  ?   ये  ही  लोग  अपने  संस्कारों  के  अनुरूप  अपराध  करते  हैं   और  समाज  में  अशांति - अव्यवस्था  फैलाते  हैं   l
    समाज  को  जागरूक  होना  होगा  कि  वह  अपने   निजी  स्वार्थ  को  छोड़कर  अपराधियों  से   दूरी   बनाये  l  जिनसे  मित्रता  करते  हैं ,  उनके  परिवार  की   ,  उसके  पिता  व  दादा  की  जानकारी  हासिल  करें  कि  कोई  किसी  जघन्य  अपराध  में  तो  सम्मिलित  नहीं  रहा  l   दुष्ट  संस्कार  कब  हावी  हो  जाएँ ,  अपराध  को  अंजाम  दें  कहा  नहीं  जा  सकता  l  

Saturday, 15 September 2018

जब धर्म , शिक्षा और चिकित्सा व्यवसाय बन जाये तो उस राष्ट्र की संस्कृति का पतन होने लगता है

  पतन  की  राह  बड़ी  सरल  है  I  जब  कामना , वासना  और  लालच  मन  पर हावी  हो  जाता  है   तब  व्यक्ति  को    धर्म ,  शिक्षा  और  चिकित्सा    जैसे  क्षेत्रों  की  पवित्रता  और  सेवा  भाव  से  कोई  मतलब  नहीं  रहता ,  इन  दुष्प्रवृत्तियों  में  अँधा  हुआ  व्यक्ति   अपने  साथ   सम्पूर्ण  समाज  को  ,  आने  वाली  पीढ़ियों  को  पतन  के  गर्त  में  धकेलता    है  I  कभी   महान  समाज  सुधारकों  ने  अनाथों ,  अपंगों , मजबूर  और  बेसहारा   बच्चे ,  बच्चियों  , महिलाओं  की  सुरक्षा   के  लिए  अनेक  कार्य  किये  ,  इतिहास में  उन्हें  स्थान  मिला  I  आज  की  स्थिति  देखकर  उनकी  आत्मा  को  कितना  कष्ट  होता  होगा  ,  सफेद पोश  के  पीछे  कितनी  कालिख  है  I
  केवल  समस्या  पर  चर्चा  करने  से  समस्या नहीं  सुलझती   I    पवित्र  और  सेवा  के    क्षेत्रों  को  व्यवसाय  बनाने  वालों  को  अब  सुधरना  होगा ,  बहुत  धन  कमा  लिया ,  अपनी  ओर  उम्मीद  लेकर  आने  वालों  का  हर  तरह  से  बहुत  शोषण  कर  लिया ,  संरक्षक  की  आड़  में  उत्पीड़न  किया  I  ईश्वर के  न्याय  से  डरो  I
  अभी  भी  वक्त  है  ,  इन  क्षेत्रों  के  पुरोधा    संकल्प  ले  लें  कि  कलंक  का  टीका  लगाकर  नहीं  जाना  है  ,  अपनी  कमजोरियों  पर  नियंत्रण  रख   स्वस्थ  समाज  का  निर्माण  करना  है  I  अच्छाई  की ओर  एक  कदम  बढ़ाना  जरुरी  है   I