समाज में आतंक , चोरी , लूट , हत्या , अपहरण , नशा , जुआ आदि दुष्प्रवृत्तियों का कारण है ---- लोगों की मानसिकता का प्रदूषित होना । इस प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है --- नशा । अश्लील फिल्म , दूषित साहित्य तो सारे समाज की मानसिकता को प्रदूषित कर देता है । कहते हैं इन सबसे प्रकृति भी कुपित हो जाती है और बाढ़ , सूखा, भूकंप , महामारी आदि प्राकृतिक प्रकोप बढ़ जाते हैं । यदि सुख - शान्ति से जीना है , स्वस्थ रहना है तो ----- साम -दाम , दंड - भेद --- किसी भी तरीके से लोगों की मानसिकता को प्रदूषित करने वाले कारणों को समाप्त करना होगा । सुख शान्ति के महल के लिए परिष्कृत विचारों की मजबूत नींव जरुरी है ।
Tuesday, 31 January 2017
Wednesday, 25 January 2017
भ्रष्टाचार की सोच ने पूजा - पाठ और पुण्य कार्यों की परिभाषा बदल दी
आज के समय में कथा , प्रवचन , हर प्रकार की पूजा एक व्यवसाय है , आकर्षक रोजगार है । लोग स्वयं अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत कर , बुरी आदतों को छोड़कर अपने ह्रदय में विराजमान ईश्वर को जाग्रत करने का परिश्रम करना नहीं चाहते , वे तो धन के बल पर , चढ़ावा चढ़ाकर ईश्वर की कृपा चाहते हैं ।
व्यक्ति पूजा - पाठ चाहे न करे , केवल अपना कर्तव्य - पालन ही ईमानदारी से करे तो सारी समस्याएं हल हो जायें । संसार में रहकर अपना कर्तव्यपालन ही सबसे बड़ी पूजा है , जब व्यक्ति इसी से दूर भाग रहा है तो शान्ति कैसे हो ?
आज लोग पुण्य भी करते हैं तो उसकी आड़ में बड़ी बेईमानी कर लेते हैं जैसे ---- जैसे एक शिक्षक है या डाक्टर है , उसने किसी प्रकार रोजगार प्राप्त कर लिया l अब वह अपने वेतन के अतिरिक्त और बड़ी कमाई करना चाहता है तो वह सांठ-गाँठ करके अपने वेतन का कुछ हिस्सा किसी को देकर , अपनी जगह उसे भेज देगा और स्वयं कहीं कोई व्यवसाय करके और धन कमाएगा ।
जब व्यक्ति की सोच में बेईमानी आ जाती है तो वह समझता है कि उसने किसी को रोजगार देकर पुण्य किया और अतिरिक्त कार्य करके ' कर्मठ ' बन गया किन्तु सच्चाई यह हुई कि विद्दार्थी को योग्य व्यक्ति से ज्ञान नहीं मिला , कई लोग गलत इलाज के कारण और बीमार हो गए ।
जब सोच में ईमानदारी न हो तो ऐसे लोग जुड़कर बड़ी श्रंखला बना लेते हैं और हर व्यक्ति अपना प्रतिशत लेकर चुप रहता है , लेकिन ईश्वर की निगाह से कुछ छुपता नहीं है ।
इसीलिए पूजा पाठ , दान - पुण्य करने के बाद भी जीवन में अशान्ति है ।
आज की सबसे बड़ी जरुरत है --- सोच सकारात्मक हो ।
व्यक्ति पूजा - पाठ चाहे न करे , केवल अपना कर्तव्य - पालन ही ईमानदारी से करे तो सारी समस्याएं हल हो जायें । संसार में रहकर अपना कर्तव्यपालन ही सबसे बड़ी पूजा है , जब व्यक्ति इसी से दूर भाग रहा है तो शान्ति कैसे हो ?
आज लोग पुण्य भी करते हैं तो उसकी आड़ में बड़ी बेईमानी कर लेते हैं जैसे ---- जैसे एक शिक्षक है या डाक्टर है , उसने किसी प्रकार रोजगार प्राप्त कर लिया l अब वह अपने वेतन के अतिरिक्त और बड़ी कमाई करना चाहता है तो वह सांठ-गाँठ करके अपने वेतन का कुछ हिस्सा किसी को देकर , अपनी जगह उसे भेज देगा और स्वयं कहीं कोई व्यवसाय करके और धन कमाएगा ।
जब व्यक्ति की सोच में बेईमानी आ जाती है तो वह समझता है कि उसने किसी को रोजगार देकर पुण्य किया और अतिरिक्त कार्य करके ' कर्मठ ' बन गया किन्तु सच्चाई यह हुई कि विद्दार्थी को योग्य व्यक्ति से ज्ञान नहीं मिला , कई लोग गलत इलाज के कारण और बीमार हो गए ।
जब सोच में ईमानदारी न हो तो ऐसे लोग जुड़कर बड़ी श्रंखला बना लेते हैं और हर व्यक्ति अपना प्रतिशत लेकर चुप रहता है , लेकिन ईश्वर की निगाह से कुछ छुपता नहीं है ।
इसीलिए पूजा पाठ , दान - पुण्य करने के बाद भी जीवन में अशान्ति है ।
आज की सबसे बड़ी जरुरत है --- सोच सकारात्मक हो ।
Tuesday, 24 January 2017
सद्बुद्धि के प्रकाश की जरुरत है
वर्तमान समय में लोग अपने जीवन में मिली खुशियों का आनन्द नहीं मनाते बल्कि अपना अधिकांश समय दूसरों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने में कि किस तरह दूसरों को उत्पीड़ित किया जाये , अपनी प्रभुता कायम की जाये , ऐसी ही बातों में बिता देते हैं । इस तरह के लोग संगठित रहकर ही अपनी योजनाओं को अंजाम देते हैं ।
ऐसी ही समस्याओं से निपटने के लिए विवेक की जरुरत है । ऐसे लोगों से विवाद करना , बहस करना उचित नहीं होता । ये लोग संगठित होते हैं इसलिए बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं । आज के समय में सतत जागरूक रहने की जरुरत है । यदि हमारे जीवन की दिशा सही है , हम स्वयं किसी का अहित नहीं करते तो इन कांटो के बीच भी राह निकल आती है ।
ऐसी ही समस्याओं से निपटने के लिए विवेक की जरुरत है । ऐसे लोगों से विवाद करना , बहस करना उचित नहीं होता । ये लोग संगठित होते हैं इसलिए बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं । आज के समय में सतत जागरूक रहने की जरुरत है । यदि हमारे जीवन की दिशा सही है , हम स्वयं किसी का अहित नहीं करते तो इन कांटो के बीच भी राह निकल आती है ।
Monday, 23 January 2017
कर्मयोगी बने
हमारी अधिकांश समस्याओं का कारण है ----- आलस | आज व्यक्ति सोचता है कि कम परिश्रम कर के ज्यादा पैसा कमा लें । इसके पीछे एक कारण यह भी है कि अधिकांश माता - पिता अपने बच्चों को सारी सुख - सुविधाएँ देकर बहुत आराम - तलबी से रखते हैं , इससे वे बच्चे बड़े होकर संघर्ष करने से डरते हैं । अपना कार्य दूसरों पर टालते हैं या करना भी पड़े तो बोझ समझ कर करते हैं । आलसी स्वभाव होने से ' आत्म निर्भर होना , स्वाभिमान से जीना ' जैसी भावना समाप्त हो जाती है , इससे बेईमानी और भ्रष्टाचार जैसी समस्या कि मेहनत न करनी पड़े , चालाकी से ज्यादा कमा लो --- ऐसे विचारों को बल मिलता है ।
आज पुन: गुरुकुल जैसी व्यवस्था की जरुरत है जहाँ बच्चों को गुरुमाता का स्नेह भी मिलता था और राजा हो या रंक , कृष्ण हों या सुदामा सबको अथक परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त करना पड़ता था ।
वैज्ञानिक युग ने हमें बहुत सुविधाएँ दी हैं , हम इन सुविधाओं के साथ संघर्ष का समन्वय करें , ये सुख - सुविधा के साधन हमें आलसी न बनायें ।
आज पुन: गुरुकुल जैसी व्यवस्था की जरुरत है जहाँ बच्चों को गुरुमाता का स्नेह भी मिलता था और राजा हो या रंक , कृष्ण हों या सुदामा सबको अथक परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त करना पड़ता था ।
वैज्ञानिक युग ने हमें बहुत सुविधाएँ दी हैं , हम इन सुविधाओं के साथ संघर्ष का समन्वय करें , ये सुख - सुविधा के साधन हमें आलसी न बनायें ।
Sunday, 22 January 2017
आज की सबसे बड़ी जरुरत है ----- विवेक
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में छोटी - बड़ी अनेक समस्याएं , उलझने आती रहती हैं , यदि विवेक न हो तो ये समस्याएं और उलझती चली जाती हैं ।
पढ़ - लिख कर बड़ी डिग्रियां लेकर मनुष्य स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता है लेकिन नशा , सिगरेट , तम्बाकू , अश्लील फिल्म व साहित्य आदि बुरी आदतों में अपना समय और उर्जा बरबाद करना मनुष्य की दुर्बुद्धि है । ऐसी आदतों से व्यक्ति की बुद्धि स्थिर नहीं रहती वह सही वक्त पर सही निर्णय नहीं ले पाता , इस कारण कभी छोटी समस्या भी विकराल रूप ले लेती है ।
बुरी आदतें इतनी आसानी से नहीं छूटती हैं इसलिए हम कम से कम एक अच्छी आदत को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करें । नि:स्वार्थ भाव से कोई भी सेवा , परोपकार का कार्य अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करें । एक यही सत्कार्य से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होने लगेगा ।
पढ़ - लिख कर बड़ी डिग्रियां लेकर मनुष्य स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता है लेकिन नशा , सिगरेट , तम्बाकू , अश्लील फिल्म व साहित्य आदि बुरी आदतों में अपना समय और उर्जा बरबाद करना मनुष्य की दुर्बुद्धि है । ऐसी आदतों से व्यक्ति की बुद्धि स्थिर नहीं रहती वह सही वक्त पर सही निर्णय नहीं ले पाता , इस कारण कभी छोटी समस्या भी विकराल रूप ले लेती है ।
बुरी आदतें इतनी आसानी से नहीं छूटती हैं इसलिए हम कम से कम एक अच्छी आदत को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करें । नि:स्वार्थ भाव से कोई भी सेवा , परोपकार का कार्य अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करें । एक यही सत्कार्य से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होने लगेगा ।
Thursday, 19 January 2017
संसार में शान्ति के लिए सच्चे अर्थों में धार्मिक होने की जरुरत है
आज के समय में अधिकांश लोग ऐसे हैं जो अपने धार्मिक स्थल पर जायेंगे , भजन - पूजन करते हैं , बहुत दान पुण्य भी करते हैं लेकिन व्याहारिक जीवन में झूठ , बेईमानी , भ्रष्टाचार , दूसरों को अकारण तंग करना ऐसे गलत कार्यों में संलग्न है , फिर भी वे धार्मिक कहे जाते हैं और समाज में उनका सम्मान है |
सच्चे अर्थों में धार्मिक होना पड़ेगा , मेहनत और ईमानदारी से काम करके अपने बाह्य जीवन को सफल बनाना होगा और परोपकार , सेवा निष्काम भाव से करके अपने मन को निर्मल बनाना होगा जिससे जीवन में सुख शान्ति प्राप्त हो सके |
सच्चे अर्थों में धार्मिक होना पड़ेगा , मेहनत और ईमानदारी से काम करके अपने बाह्य जीवन को सफल बनाना होगा और परोपकार , सेवा निष्काम भाव से करके अपने मन को निर्मल बनाना होगा जिससे जीवन में सुख शान्ति प्राप्त हो सके |
Monday, 9 January 2017
जीवन निर्माण की शिक्षा जरुरी है
आज लोगों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य धन कमाना है , समस्याओं से भाग कर LIFE को ENJOY करना है |। धन से समस्याएं एक सीमा तक ही हल होती हैं , यदि हमें जीवन जीना आ जाये तो धन भी कमा लेते हैं , खुशियाँ भी मना लेते हैं और जीवन भी सरलता से , शान्ति से चलता है । सुख तो मन का होता है , एक व्यक्ति सुख - साधनों पर लाखों रूपये खर्च करके भी उदास है , जीवन में खालीपन है तो दूसरी ओर सूखी रोटी खाकर भी एक व्यक्ति खुश है ।
अच्छाई और सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को दुनिया चैन से जीने नहीं देती , लोगों के प्रहार एक परीक्षा हैं , ईश्वर विश्वास और निष्काम कर्म की ताकत से ही जीवन में सफल हुआ जा सकता है ।
अच्छाई और सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को दुनिया चैन से जीने नहीं देती , लोगों के प्रहार एक परीक्षा हैं , ईश्वर विश्वास और निष्काम कर्म की ताकत से ही जीवन में सफल हुआ जा सकता है ।
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